13 मई, 2013

कामवाली बाई

 


शादी के मौसम में
व्यस्त सभी बाई रहतीं
सहन उन्हें करना पड़ता
बिना उनके रहना पड़ता
उफ यह नखरा बाई का
आये दिन होते नागों का
चाहे जब धर बैठ जातीं
नित नए बहाने बनातीं
यदि वेतन की हो कटौती
टाटा कर चली जातीं
 लगता है जैसे हम गरजू हैं
उनके आश्रय में पल रहे हैं
पर कुछ कर नहीं पाते
मन मसोस कर रह जाते |
आशा

14 टिप्‍पणियां:

  1. :) सच कहा आपने आजकल बाई का काम पर आजाना किसी दुआ से कम नहीं लगता

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  2. गरजू समझती ही हैं...सही कहा|

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  3. sahi baat ko badhiyan dhang se kahi aapne. hum bhi isi kasht ke maare hain :)


    -Abhijit (Reflections)

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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  5. गरजू तो हम ही हैं - नखरे सहने ही पड़ेंगे .उन्हें खुश रखे बिना काम चलेगा क्या ?

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  6. सही कहा आपने.. कामवाली का नखरा ऊफ़!

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  7. सही कहा आपने.. कामवाली का नखरा ऊफ़!

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  8. सभी की दुखती रग पर हाथ रख दिया है आज आपने ! सभी इस कष्ट के मारे हैं ! यहाँ भी कई दिनों से बाई हड़ताल पर है और हम उसकी ड्यूटी पर हैं ! रोचक प्रस्तुति !

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  9. नखरे तो उठाना ही पडेगा आदरेया.सुन्दर प्रस्तुति.

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