05 अगस्त, 2013

वादे


तरह तरह के फूल खिले
लोक लुभावन वादों के
बनावटी इरादों के
झरझर झरे टप टप  टपके
बिखरे देश के कौने कौने में
पर एक भी न छू पाया
परमात्मा के चरणों को
रहे दूर क्यूं कि
थे वे कागज़ के फूल
सत्यता उनमें ज़रा भी न थी
केवल वादे थे नेक इरादे न थे
आम आदमी ठगा गया
जालक में फसता गया
उन दिखावटी वादों के
हाथ उसके कुछ भी न आया
अनैतिक इरादों की
चुभन के अलावा
हारा सा ठगा सा
हो हताश देखता रह गया
भविष्य की तस्वीर को  |
आशा

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,आभार।

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  2. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति.....

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  3. हर दिन यही निराशा प्रबल है !

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  4. आपकी यह रचना कल मंगलवार (06-08-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  5. यही तो विडम्बना है कि इन नकली, बनावटी एवँ दिखावटी फूलों ने ही असली फूलों की महत्ता कम कर दी है ! जिस दिन लोग असली और नकली का फर्क करना सीख जायेंगे अपनी जंग जीत जायेंगे ! सुंदर प्रस्तुति !

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  6. सुन्दर ,सटीक और प्रभाबशाली रचना। कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  7. आपकी इस प्रस्तुति को शुभारंभ : हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 1 अगस्त से 5 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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