27 फ़रवरी, 2019

बहाना रोज का


है बहाना रोज का
रोज रोज देर से आना
झूठे सच्चे बहाने बनाना
एक ही  बात को
  कई बार दोहराना
फिर भी  मन को
दिलासा दिलाना
कुछ गलत नहीं किया है जाना
 अनजानें में हुई भूल को
सच्चा कह कर मन बहलाना
यही फितरत है उसकी
मिल कर बिछुड़ने की
 आदत है उसकी
फिर भी आदत को
सच का चोगा पहनाना
यही है मन का विचलन
उसने न जाना |
                                                आशा

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28.02.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3261 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति 88वां बलिदान दिवस - पंडित चंद्रशेखर आजाद जी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |

      हटाएं
  3. सुप्रभात
    मुझे आपका प्रस्ताव पसन्द है |आवश्यकता हेतु संपर्क करूंगी|

    जवाब देंहटाएं
  4. बहानेबाजी कुछ लोगों की फितरत होती है ! बढ़िया रचना !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: