17 जून, 2014

क्या से क्या हो गयी


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बरस दर बरस बीत गए
पुस्तकों से दूर हुए
पलट कर  न देखा कभी
क्या हाल हुआ उनका |
सोचा अब क्या लाभ
समय बर्बाद करने का
दो काम अधिक हो सकते हैं
यदि उनको लेकर ना बैठी |
समय चक्र चलता गया
व्यस्तता कम न हो पाई
आज अचानक जाने क्यूं
पुराना जखीरा ले बैठी |
बहुत पुरानी  पुस्तक थी
अक्षर घूमिल से लगे
चिन्हित अंश देखते ही
मैं विगत में खो गयी |
थी यह सबसे प्रिय मुझे
कैसे विस्मृत हो गयी
हुआ फिर  अहसास
 रचे गए आडम्बर का |
छलकी  आँखें नीर बहा 
थमने  का नाम नहीं लेता 
फिर भी सोचती रही 
मैं क्या से क्या हो गयी |

आशा

15 जून, 2014

गाँव छोटा सा




ग्राम छोटा सा
मरकत डिब्बे सा
अभिनव था |

गाँव की गौरी
सिर पर गगरी
छलक रही |

वृक्षों की छाँव
चतुष्पद धूमते
जल अभाव |

घिरे बदरा
हुआ आसमा स्याह
वर्षा आई ना|

कच्चे झोंपड़े
हरियाली के बीच
मेरे गाँव के |

मवेशी खड़े
प्रहरी चौराहे के
राह में अड़े |

आशा

14 जून, 2014

पितृ दिवस पर

पितृ दिवस पर पिता जी को शत शत नमन |कुछ हाईकू मन की अभिव्यक्ति देते :-






पिता का प्यार
मन में छिपा पर
संबल देता |

जीवन रथ
अग्रसर हो रहा
सारथी पिता |

बिना पिता के
गाडी के दो पहिये
चल न पाते |

घर अधूरा
है उजड़ी बस्ती सा
पिता के  बिना |

है पितृ मुखी
घर की है रौनक
प्यारी पिता की |

यादों  में बसे
हैं बाबूजी हमारे
संबल दे रहे |

आशा

13 जून, 2014

एक रथ दो पहिये (पितृ दिवस पर )





एक रथ के दो पहिये हैं
पिता और माता
दोनो खींचते जीवन रथ
समय साक्षी होता
रथ चलता जाता
ऊर्जा किसकी कितनी
क्षय होती वही जानता |
पिता की महिमा
बच्चों से ज्यादा
कोई समझ न पाता
बिना पिता के
 कोइ कार्य
 सफल ना होता
पिता पिता है
उसका स्थान
 कोई ना ले पाता
महानता उसकी देखो
 कभी एहसान नही जताता |
तभी तो महिमा उसकी
ताउम्र भूल न पाते
हर छोटे बड़े लम्हे में
पिता सदा याद आते |