28 जनवरी, 2013

शब्द जाल



अंतःकरण से शब्द निकले
चुने बुने और फैलाए
दिए नए आयाम उन्हें
और जाल बुनता गया
थम न सका प्रवाह
एक जखीरा बनता गया
सम्यक दृष्टि से देखा
नया रूप नजर आया
जिसने जैसा सोचा
वैसा ही अर्थ निकल पाया
 पहले भाव शून्य से थे
धीरे धीरे प्रखर हुए
सार्थकता का बोध हुआ
उत्साह द्विगुणित हुआ
अदभुद सा अहसास लिए 
 नया करने का मन बना 
कई भ्रांतियां मन में थीं
समाधान उनका हुआ
है यह विधा ही ऐसी
दिन रात व्यस्तता रहती
समय ठहर सा जाता
मन उसी में रमा रहता
है प्रभाव उन शब्दों का
जो जुडने को मचलते 
बाक्यों  में बदलते
उनसे  अनजाने में
 कई रचनाएं बनतीं  
कविता से कविता बनती
आवृत्ति विचारों की होती
 स्वतः ही मन खिचता 
फिर से फँस जाता
शब्दों के जाल में |
आशा