27 फ़रवरी, 2013

आतंकवादी

कटुता ने पैर पसारे 
शुचिता से कोसों दूर हुआ 
अनजाने में जाने कब 
अजीब सा परिवर्तन हुआ 
सही गलत का भेद भी 
मन समझ नहीं पाया 
सहमें सिमटे कोमल भाव 
रुके ठिठक कर रह गए 
हावी हुआ बस एक विचार
कैसे किसे आहत करे |
धमाका करते वक्त भी 
ना दिल कांपा ना हाथ रुके 
ऐसी अफ़रातफ़री मची 
मानवता चीत्कार उठी
फंसे निरीह लोग ही 
हादसे का शिकार हुए 
आहत हुए ,कई मरे 
अनगिनत घर तवा़ह हुए
शातिरों की जमात का तब भी 
एक भी बन्दा विदा न हुआ 
शायद उन जैसों के लिए 
ऊपर भी जगह नहीं 
गुनाहों की  माफी़ के लिए 
कहीं भी पनाह नहीं |
आशा