20 मई, 2013

कितना नीरस होता

एक हथोड़ा व एक बांसुरी 
एक साथ रहते 
जीवन कितना गुजर गया
यह तक नहीं सोचते  |
था हथोड़ा कर्मयोगी 
महनतकश  पर हट योगी 
सदा भाव शून्य रहता 
खुद को बहुत समझता |
थी बांसुरी स्वप्न सुन्दरी 
कौमलांगिनी भावों से भरी
मदिर मुस्कान बिखेरती 
स्वप्नों में खोई रहती |
जब भी ठकठक सुनती 
तंद्रा उसकी भंग होती 
आघात मन पर होता 
तभी वह विचार करती |
क्या कोइ स्थान नहीं उसका 
उस कर्मठ के जीवन में 
पर शायद वह सही न थी 
भावनाएं सब कुछ न थीं 
जीवन ऐसे नहीं चलता 
ना ही केवल कर्मठता से |
जो डूबा रहता भावों में 
कल्पना की उड़ानों  में
तब घर घर नहीं रहता 
संधर्ष सदा होता रहता |
यह कैसा संयोग कि 
दौनों साथ साथ रहते 
एक दूसरे को समझते 
आवश्यकताएं जानते 
एक की कर्मठता 
और दूसरे की भावनाएं 
यदि साथ ना होतीं 
जीवन कितना नीरस होता |
आशा