28 दिसंबर, 2009

मेरी पहचान

जब मैं छोटी बेटी थी मनसा था मेरा नाम
बड़ी शरारत करती थी पर थी मैं घर की शान |
वैसे तो माँ से डरती थी ,
माँ के आँख दिखाते ही मैं सहमी-सहमी रहती थी ,
मेरी आँखें ही मन का दर्पण होती थीं,
व मन की बातें कहती थीं
एक दिन की बताऊँ बात ,
जब मैं गई माँ के साथ ,
सभी अजनबी चेहरे थे ,
हिल मिल गई सभी के साथ ,
माँ ने पकड़ी मेरी चुटिया
यही मेरी है प्यारी बिटिया ,
मौसी ने प्यार जता पूछा ,
"इतने दिन कहाँ रहीं बिटिया? "
तब यही विचार मन में आया ,
क्या मेरा नाम नही भाया ,
जो मनसा से हुई आज बिटिया
बस मेरी बनी यही पहिचान ,
'माँ की बिटिया' 'माँ की बिटिया' |
जब मै थोड़ी बड़ी हुई ,
पढ़ने की लगन लगी मुझको ,
मैंने बोला, "मेरे पापा मुझको शाला में जाना है !"
शाला में सबकी प्यारी थी ,
सर की बड़ी दुलारी थी ,
एक दिन सब पूंछ रहे थे ,
"कक्षा में कौन प्रथम आया ,
हॉकी में किसका हुआ चयन ?"
शिक्षक ने थामा मेरा हाथ ,
परिचय करवाया मेरे साथ ,
कहा, "यही है मेरी बेटी ,
इसने मेरा नाम बढ़ाया !"
तब बनी मेरी वही पहचान ,
शिक्षक जी की प्यारी शान
बस मेरी पहचान यही थी ,
मनसा से बनी गुरु की शान |
जिस दिन पहुँची मैं ससुराल ,
घर में आया फिर भूचाल ,
सब के दिल की रानी थी ,
फिर भी नहीं अनजानी थी ,
यहाँ मेरी थी क्या पहचान ,
केवल थी मै घर की जान ,
अपनी यहाँ पहचान बनाने को ,
अपना मन समझाने को ,
किये अनेक उपाय ,
पर ना तो कोई काम आया ,
न बनी पहचान ,
मै केवल उनकी अपनी ही ,
उनकी ही पत्नी बनी रही ,
बस मेरी बनी यही पहचान ,
श्रीमती हैं घर की शान ,
अब मैं भूली अपना नाम ,
माँ की बिटिया ,गुरु की शान ,
उनकी अपनी प्यारी पत्नी ,
अब तो बस इतनी ही है ,
मेरी अपनी यह पहचान ,
बनी मेरी अब यही पहचान |

आशा












3 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी पहचान को तलाशती बहुत सुन्दर कविता । औरों के फ्रेम में अपना चेहरा नारी बहुत देख चुकी । अब ज़रूरत है कि वह स्वयम को सिद्ध करे और अपना चेहरा अपने ही फ्रेम में लगा कर अपना परिचय स्वयम गढ़े । नव वर्ष की अशेष शुभकामनाओं और अभिनन्दन के साथ , साधना

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (27-04-2014) को ''मन से उभरे जज़्बात (चर्चा मंच-1595)'' पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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