23 सितंबर, 2011

ओ अजनवी


जान न पाया कहाँ से आई
ओर हों कौन ओ अजनवी
जाने कब तुम्हारा आना
मेरे जीने का बहाना हों गया |
ये सलौना रूप और पैरहन
और आहट कदमों की
छिप न पाये हजारों में
ले चले दूर बहारों में |
दिल में हुई हलचल ऐसी
सम्हालना उसे मुश्किल हुआ
हर शब्द जो ओंठों से झरा
हवा में उछला फिज़ा रंगीन कर गया |
हों तुम पूरणमासी
या हों धुप सुबह की
साथ लाई हों महक गुलाब की
तुम्ही से गुलशन गुलजार हों गया |
चहरे का नूर और अनोखी कशिश
रंगीन इतनी कि
रौशनी का पर्याय हों गयी |
दिल में कुछ ऐसे उतारी
गहराई तक उसे छु गयी
वह काबू में नहीं रहा
कल्पना में खो गया |

आशा


15 टिप्‍पणियां:

  1. रौशनी का पर्याय हों गयी |
    दिल में कुछ ऐसे उतारी
    गहराई तक उसे छु गयी
    वह काबू में नहीं रहा
    कल्पना में खो गया |bhaut hi sundar....

    जवाब देंहटाएं
  2. रौशनी का पर्याय हों गयी
    दिल में कुछ ऐसे उतारी
    गहराई तक उसे छु गयी
    वह काबू में नहीं रहा
    कल्पना में खो गया
    बहुत ही बढ़िया
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. चहरे का नूर और अनोखी कशिश
    रंगीन इतनी कि
    रौशनी का पर्याय हों गयी |
    बेहतरीन शब्द चयन और बहुत ही सशक्त भावाभिव्यक्ति ! अति सुन्दर !

    जवाब देंहटाएं
  5. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी-पुरानी हलचल पर 24-9-11 शनिवार को ...कृपया अनुग्रह स्वीकारें ... ज़रूर पधारें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएं ...!!

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सशक्त भावाभिव्यक्ति|

    जवाब देंहटाएं
  8. अजनबी का कल्पना में उतरना प्रभावित कर गया. बधाई आशा जी.

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: