01 अगस्त, 2012

उड़ चला पंछी


उड़ चला पंछी कटी पतंग सा
अपनी यादें छोड

समस्त बंधनों से हो  मुक्त 
उस अनंत आकाश में
छोड़ा सब कुछ यहीं
यूँ ही इसी लोक में
बंद मुट्ठी ले कर आया था
आते वक्त भी रोया था
इस दुनिया के
प्रपंच में फँस कर
जाने कितना सह कर
इसी लोक में रहना था
आज मुट्ठी खुली हुई थी
जो पाया यहीं छोड़ा
पुरवासी परिजन छूटे
वे रोए याद किया
अच्छे कर्मों का बखान किया
पर बंद आँखें  न खुलीं
वह चिर निद्रा में सो गया
वारिध ने भी दी जलांजलि
वह बंधन मुक्त  हो गया
पञ्च तत्व से बना पिंजरा
अग्नि में विलीन हो गया |
आशा















6 टिप्पणियाँ:

Blogger Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

1 अगस्त 2012 को 3:08 pm  
Blogger अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

प्रेरित करती कविता..

1 अगस्त 2012 को 3:51 pm  
Blogger धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बेहत्तरीन प्रेरित करती रचना,,,,

रक्षाबँधन की हार्दिक शुभकामनाए,,,
RECENT POST ...: रक्षा का बंधन,,,,

1 अगस्त 2012 को 11:09 pm  
Blogger Sadhana Vaid ने कहा…

सार्थक चिंतन ! बहुत सुन्दर !

2 अगस्त 2012 को 1:14 pm  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
श्रावणी पर्व और रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

2 अगस्त 2012 को 4:30 pm  
Blogger Asha Joglekar ने कहा…

देस ये बेगाना हुआ
पंछी अपने देस गया ।

दर्शन भरी प्रस्तुति ।

22 सितंबर 2012 को 8:00 pm  

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