28 सितंबर, 2012

विचलन

चारों और घना अन्धकार 
मन होता विचलित फँस कर 
इस माया जाल में 
विचार आते भिन्न भिन्न
कभी शांत उदधि की तरंगों से
तो कभी उन्मत्त उर्मियों से
वह शांत न रह पाता
कहाँ से शुरू करू ?
क्या लिपिबद्ध  करूं ?
मैं समझ नहीं पाता
है सब  मकड़ी के जाले सा
वहाँ  पहुंचते ही फिसल जाता 
सत्य असत्य में भेद न हो पाता
आकाश से टपकती बूँदें
कराती नया अद्भुद अनुभव
पर दृश्य चारों और का
कुछ और ही अहसास कराता
कहीं भी एकरूपता नहीं होती
कैसे संवेदनाएं नियंत्रित करूं
मन  विचलित ना हो जाए
ऐसा क्या उपाय करूं ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं भी एकरूपता नहीं होती
    कैसे संवेदनाएं नियंत्रित करूं
    मन विचलित ना हो जाए
    ऐसा क्या उपाय करूं ?karuna ka sagar hain ye pangtiyan......

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  2. aapki kavita padhkar aisa lagta hai mano aap mann padhti ho...
    bahut sundar

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (29-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. बहुत गहन अभिव्यक्ति वाह

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  5. मन की ऊहापोह को बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है ! बहुत बढ़िया प्रस्तुति !

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