09 अक्तूबर, 2012

मनुहार



एक मोर एक मोरनी ,पहुंचे जमुना तीर
पंख पसारे नाचते ,मन की हरते पीर  ||

प्यार भरा अंदाज नया ,मन हरता चितचोर |
कान्हां को पा गोपियाँ ,हुईं आत्म बिभोर ||

थिरकते कदम बहकते ,पा बंसी का साथ
गुमान से भर उठतीं पा कान्हां का साथ ||

डाह से बंसी छिपाई ,जिसके मीठे बोल
राधा यह भी जानती कितनी है अनमोल ||

पाकर अपनी बांसुरी ,कान्हां भूले साथ |
खोजती स्वयं को उसमें,ले हाथों में हाथ ||

आँखों से अश्रु झरते ,मोती से अनमोल |
कान्हां की मनुहार के ,प्यारे लगते बोल ||

बेनु सुधा बरसन लगी ,मन में उठत हिलोर
जाने कैसे रात गयी ,होने को है भोर ||

हरे भरे वन महकते ,फूलन लगे पलाश |
उस मधुवन में खोजती, विरहण मन की प्यास ||
आशा 

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर दोहे ... मनभावन प्रस्तुति

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  2. वाह.....
    बहुत खूबसूरत.....


    सादर
    अनु

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  4. कृष्ण के प्रति हर अनुराग की बखूबी प्रस्तुति ,आभार सहित |

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  5. बहुत बढ़िया काव्य टिप्पणियाँ .नूरा कुश्ती तो बहुत देखी यहाँ नूरा कुंडली कुंडली खेल रहें हैं आप और अरुण कुमार निगम साहब .बढ़िया तंज़ और व्यंजना ला रहे हो नित्य प्रति रविकर भैया .


    बेनु सुधा बरसन लगी ,मन में उठत हिलोर
    जाने कैसे रात गयी ,होने को है भोर ||

    हरे भरे वन महकते ,फूलन लगे पलाश |
    उस मधुवन में खोजती, विरहण मन की प्यास ||

    आशा जी सक्सेना प्रकृति नटी के सौन्दर्य की साथ गोप किलोल का रस वर्षन पूरी रचना में हैं ,

    हरित बांस की बांसरी ,मुरली लइ लुकाय ,सौंह धरे ,भौहन हँसे ,देन करत नट जाय .

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ! आपने तो घर बैठे मथुरा वृन्दावन के दर्शन करा दिए ! बहुत बढ़िया रचना !

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. पूरा प्रसंग इस बात का प्रतीक प्रतीत होता है कि तन,मन और आत्मा तीनों की प्यास महत्वपूर्ण है। इन तीनों की आवश्यकताएं अलग-अलग हैं,जिनका साझा समाधान है- प्रेम। जिसे वह मिला,सार्थक हुआ उसका जीना। ऐसों के जीने से ही दुनिया की भी सार्थकता।

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  9. कान्हा की नगरी की सैर हो गयी ये तो ...बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  10. गोप गोपियाँ झूमते,मोर मोरनी संग
    जमुना सतरंगी हुई,सुंदर प्रेम प्रसंग |

    एक तरफ राधा करे,मीठी धुन की चाह
    दूजे सौतन मानकर,मन में करती डाह |

    बहुत ही मनभावन,कान्हामय करते हुए दोहे.

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  11. पाकर अपनी बांसुरी ,कान्हां भूले साथ |
    खोजती स्वयं को उसमें,ले हाथों में हाथ ||

    आँखों से अश्रु झरते ,मोती से अनमोल |
    कान्हां की मनुहार के ,प्यारे लगते बोल ||

    बहुत सुन्दर...
    भावविभोर हो गयी पढ़ते-पढ़ते..!

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  12. आप सब का ब्लॉग पर आने के लिए और अपने विचार टिप्पणी के रूप में देने के लिए आभार |
    आशा

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