04 मई, 2013

आनंद कुछ और ही होता

तारों भरे आकाश में 
ले ज्योत्सना साथ में 
मयंक चला भ्रमण करने 
अनंत व्योम के विस्तार में 
सभी चांदनी में नहाए 
ज्योतिर्मय हुए 
क्या पृथ्वी क्या आकाश 
पर पास के अभयारण्य में 
यह सब कहाँ 
धने पेड़ों की टहनियां
 आपस में बात करतीं
आपस की होती सुगबुगाहर 
विचित्र सी आवाज से
मन में भय भरती
सांय सांय चलती हवाएं 
आहट किसी अनजान के 
पद चाप की
अदृश्य शक्ति का अहसास करा 
भय दुगुना करती 
कभी छन कर आती रौशनी में 
कोई छाया दिखाई देती 
मन में भय उपजता 
सही राह न दिखाई देती 
एकाएक ठिठकता सोचता 
कहीं यह भ्रम तो नहीं 
साहस कर कदम आगे बढाता 
फिर भी अकेलापन सालता 
काश कोइ साथ होता 
राह तो दिखाता 
चांदनी रात में तब घूमने  का
आनंद कुछ और ही होता |
आशा





16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर चितरण..आभार

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-05-2013) के चर्चा मंच 1235 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  3. तारों भरे आकाश में
    ले ज्योत्सना साथ में
    मयंक चला भ्रमण करने
    अनंत व्योम के विस्तार में
    बहुत खूबसूरत भाव... आभार आशाजी

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  4. इतनी सुंदर तारों भरी चाँदनी रात में भय कैसा ! भय मन का विकार है उसे दूर भगा दीजिए और इस अद्भुत नज़ारे का आनंद लीजिए ! बहुत सुंदर रचना है ! बधाई !

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार...!
    --
    सुखद सलोने सपनों में खोइए..!
    ज़िन्दगी का भार प्यार से ढोइए...!!
    शुभ रात्रि ....!

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  6. काश हर कदम कोई हमारे साथ चले हमें राह दिखाए.
    मन के भावों को व्यक्त करती रचना.आभार

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