12 सितंबर, 2013

अपनी भाषा


भारत में जन्मीं रची बसी
मिट्टी के कण कण में
यहाँ कई प्रदेश विभिन्न वेश
भाषाएँ भी जुदा जुदा
तब भी जुड़े एक बंधन में
संस्कृति के समुन्दर में
पर है  अकूट भण्डार साहित्य का
हर भाषा लगती  विशिष्ट
और धनवान अपने वैभव में
हिन्दी भी है उनमें एक  
न जाने क्यूं लगता है
सरल सहज अभिव्यक्ति के लिए
उसके जैसा कोइ नहीं
तब भी जंग चल रही है
अस्तित्व को बचाने की
उसे राष्ट्र भाषा बनाने की
वर्षों तक गुलाम रहे
मन मस्तिष्क भी परतंत्र हुआ
अंग्रेजी  सर चढ़ कर बोली
काम काज की भाषा बनी
भूल गए अपनी भाषा ,
अपनी संस्कृति ,उसकी महानता
तभी तो आज यहाँ अपनी  भाषा 
खोज रही अस्तित्व अपना |

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 13/09/2013 को
    आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः17 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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    1. टिप्पणी और सूचना हेतु धन्यवाद और आभार |

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  2. धीरे धीरे ही सही ,हिंदी का प्रभाव बढ़ रहा है
    latest post गुरु वन्दना (रुबाइयाँ)

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  3. हिंदी हमारे देश की प्रमुख भाषा है,हमारा कर्तव्य बनता है कि हिन्दी भाषा का मान रखे !!!
    सुंदर सृजन ! बेहतरीन रचना, !!

    RECENT POST : बिखरे स्वर.

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  4. आज की विशेष बुलेटिन 625वीं बुलेटिन और एकता की मिसाल में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-09-2013) महामंत्र क्रमांक तीन - इसे 'माइक्रो कविता' के नाम से जानाः चर्चा मंच 1368 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. टिप्पणी और सूचना हेतु धन्यवाद और आभार शास्त्री जी |
      आशा

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  6. टिप्पणी हेतु धन्यवाद अरुण जी |
    आशा

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  7. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. बहुत सुंदर .....हिंदी को सम्मान मिलना ही चाहिए

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  9. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. अपनी राष्ट्र भाषा की यह दुर्दशा देख मन आहट होता है ! इसका उद्धार तभी संभव है जब हम अंग्रेज़ी की मानसिक गुलामी से स्वयं को स्वतंत्र कर पायेंगे ! सामयिक विषय पर बेहतरीन रचना !

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  11. हर भाषा लगती विशिष्ट
    और धनवान अपने वैभव में
    हिन्दी भी है उनमें एक
    न जाने क्यूं लगता है
    सरल सहज अभिव्यक्ति के लिए
    उसके जैसा कोर्इ नहीं


    सचमुच, हिन्दी जैसी कोर्इ और नहीं।

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