15 सितंबर, 2013

नाता तेरा मेरा



जन्म से आज तक
 कष्टों से नाता रहा
तुझ को न भूल पाया
तुझ में खोना चाहा |
हैं प्रश्न  अनुत्तरित
बारम्बार सताते  फिर भी
है तेरा मेरा क्या नाता
 यह जग मुझे क्यूं भाता
यह छूट क्यूं नहीं पाता ?
है  एक सेतु दौनों के बीच
इह लोक से जाने के लिए
तुझसे मिलने के लिए
पर इतना सक्षम नहीं
स्वयं पहुँच नहीं पाता  |
जाने कितनों को पहुंचाया
हर बार बापिसी हुई
पृथ्वी पर भार बढाया
आकांक्षा अधूरी रही |
तुझे खोजने में
तुझ तक पहुँचने में
त्रिशंकु हो कर रहा गया
प्रश्न वहीं का वहीं
अनुत्तरित ही रहा
है तेरा मेरा क्या नाता
आशा


26 टिप्‍पणियां:

  1. गहन अभिव्यक्ति ! सुंदर सार्थक रचना ! बहुत खूब !

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
    चर्चामंच 1370 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

    जवाब देंहटाएं
  3. नमस्कार आपकी यह रचना आज सोमवार (16-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही गहन अनुभूति लिए बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुती आपका आभार आदरेया आशा जी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. टिप्पणी हेतु धन्यवाद राजेन्द्र जी |
      आशा

      हटाएं

Your reply here: