16 फ़रवरी, 2014

पथिक गलत न था


दीपक जला तिमिर छटा
हुआ पंथ रौशन
जिसे देख फूला न समाया
गर्व से सर उन्नत
एक ययावर जाते जाते
ठिठका देख उसका तेज
खुद को रोक न पाया
एकाएक मुंह से निकला
रौशन पंथ किया अच्छा किया
पर कभी झांका है
अपने आसपास ऊपर नीचे
दीपक की लौ कपकपाई
कोशिश व्यर्थ गयी
देख न पाई तिमिर
दीपक के नीचे
पर पंथी की बात कचोट गयी
उसके गर्वित  मन को
जब गहराई से सोचा
पाया पथिक गलत न था
परमार्थ में ऐसा डूबा
अपना तिमिर मिटा न सका
पर फिर मन को समझाया
कुछ तो अच्छा किया |
आशा

18 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha pathik ne lekin deepak ka purusharth bhi paropkari tha ..sundar rachna ..

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-02-2014) को "पथिक गलत न था " (चर्चा मंच 1526) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सन्तोष ही परम सुख है ....कुछ तो किया ......बहुत बढ़िया
    latest post प्रिया का एहसास

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    1. टिप्पणी लेखन को प्रखर करती है |धन्यवाद सर |

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  4. बहुत सुंदर रचना ! अपने हितों का त्याग करके ही परोपकार किया जा सकता है ! दीपक के परमार्थ की भावना की उपेक्षा नहीं की जा सकती !

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  5. बहुत सुन्दर सन्देशप्रद सार्थक रचना ..

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  6. सुन्दर रचना-
    आभार आदरणीया-

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  7. उत्तर
    1. इस माह के अंत तक मेरी नई पुस्तक सुनहरी धूप छाप कर आ जाएगी |

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  8. उत्तर
    1. टिप्पनी हेतु धन्यवाद सतीश जी |मुझे आपकी कविता बहुत अच्छी लगी |

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