06 फ़रवरी, 2014

सर्दी गयी वसंत आया

सुर्ख गुलाब से अधर तुम्हारे
अपनी ओर स्वतः खींचते
मोह बंध में बांधे रखते
ममता की भाषा समझते |
चाहत है उसे प्यार करूँ 
बेहिचक उसे स्वीकार करूँ 
पर विवेक रोकता है 
है यह एक छलावा 
इससे दूरी ही बेहतर है |

रंग वासंती चहु और बिखरा
मुखड़ा धरती का निखरा 
आ गयी वासंती पवन 
छा गयी आँगन आँगन |
आशा

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.02.2014) को "सर्दी गयी वसंत आया" (चर्चा मंच-1515) पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. वसंत के रंग और वासंती पवन की उत्कट प्रतीक्षा है अभी तो - वसंतपंचमी पर शुभकामनाएँ !

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रवास के कारण वसंत का स्वागत करने में कुछ विलम्ब अवश्य हो गया है लेकिन यह मनमोहक ऋतु अपने सौंदर्य से सदैव हर्षित करती रहती है ! सुंदर रचनायें !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: