22 जून, 2018

प्रेम के फल

गहरे बोए बीज प्रेम के
सींचा प्यार के जल से
मुस्कान की खाद डाली
 इंतज़ार किया शिद्दत से
बहुत इंतज़ार के बाद
दिखे अंकुरित होते चार पांच
 हुई  अपार प्रसन्नता देख  उन्हें
 देखरेख और बढाई
पर एक दिन नफरत की आंधी ने
अपनी सीमा लांघी
 दो  पौधे  धराशाही हो गए
मन यह सह न पाया
किया जतन उसको सहेज कर
 एक गमले में लगाया
अब रोज लगा रहता कहीं
 नफरत उसे हानि न पहुंचाए
धीरे धीरे वह पनपने लगा
दो से पर्ण हुए चारसे आठ
 तने में भी आई थोड़ी शक्ति
पल्लवित पौधा देख कर
लगता कब बड़ा होगा
 प्रेम के फल जाने कब लगेंगे
ज़रा से संयम ने फलित किया प्रेम फल
बैर भाव जाने कहाँ  हुआ तिरोहित
प्रेम के फल  भर गए मिठास से |
आशा



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