18 सितंबर, 2018

तृष्णा



इस जिन्दगी के मेले में
अनगिनत झमेले हैं
माया तृष्णा मद मोह
मुझे चारो ओर से घेरे हैं |
ममता का आँचल
सर पर से हटते ही
घरती पर आ कर गिरी
तभी सच्चाई के दर्शन हुए |
दुनियादारी में ऐसी उलझी
माया मोह में लिप्त हुई
जैसे तैसे मन पर किया नियंत्रण
इन से छुटकारा पाने के लिए |
पर तृष्णा से पार न पाया
ज्यों ज्यों किया संवरण
इसका मुंह बढ़ता गया
सुरसा के मुख सा |
खुद पर कितना करती नियंंत्रण
अंत हीन राह पर चलते
हारी थकी प्रभु तेरी शरण में आई
तृष्णा से फिर भी खाई मात |
उससे जीत न पाई
जितनी दूरी बनाती उससे
फिर वहीँ खुद को पाती हूँ
बस यहीं हार  जाती हूँ |


आशा

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