13 अप्रैल, 2019

स्वप्न अधूरा रह जाता



रोज रात रहता
 पहरा स्वप्नों का
उनमें भी वर्चस्व तुम्हारा
 तुमसे ही जाना है
तुमसे ही तुम्हें चुराया है
हमने  अपने ख्वावों  से
चुराया है तुम्हें
जब भी स्वप्न आते हैं
चाहे जो भी हो उनमें
 मुख्य पात्र तुम्ही होते हो
तुम्हारे बिना कोई
 स्वप्न पूरा न होता
जैसे ही आँखें खुल जाती हैं
तुम न जाने कहाँ हो जाते तिरोहित
मन को बहुत संताप होता 
जब मुख्य पात्र  ही कहीं
 गुम हो जाता है
प्रमुख पात्र के खो जाने से
 उदासी हावी हो जाती
फिर नींद नहीं आती
 तारे गिन गिन कटती रातें
तुम क्या जानों
 है प्रमुख पात्र की भूमिका क्या ?
सारे सुख रस विहीन हो जाते
जब तक तुम बापिस न आते
कोई तुम्हारी जगह न ले पाता
 स्वप्न अधूरा ही रह जाता |
आशा                    

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-04-2019) को "दया करो हे दुर्गा माता" (चर्चा अंक-3305) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    दुर्गाअष्टमी और श्री राम नवमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सूचना हेतु आभार सर |आपको भी शुभ कामनाएं सपरिवार |

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  2. बहुत सुंदर ,सादर नमस्कार आप को

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    1. सुप्रभात
      टिप्पणी हेतु धन्यवाद कामिनी जी |

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 13/04/2019 की बुलेटिन, " १०० वीं बरसी पर जलियाँवाला बाग़ कांड के शहीदों को नमन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. सुप्रभात
    सूचनाहेतु आभार सर |

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  5. अधूरे स्वप्न का एहसास भी अलग होता है
    बहुत सुंदर रचना

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  6. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद वर्मा जी |

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  7. वाह ! क्या बात है ! बड़ी प्यारी सी रूमानी रचना ! बहुत सुन्दर !

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