04 अप्रैल, 2019

शाला का प्रथम दिन


नया बस्ता नई यूनीफार्म
उत्साह अधिक शाला जाने का
 अपनी सहेलियों से मिलाने का
पर वह अकेली  है उदास
उसकी  नई ड्रेस नहीं आई अभी तक  
बहुत बेमन से पुरानी ड्रेस पहन कर
अलग अलग जाती दीखती
मन की बात किससे कहे
अभी तक पैसों का जुगाड़ नहीं हुआ है
नया सामान लाने को
मां ने कहा है
 अभी इसी से काम चलाओ
अगले मांह कुछ तो जुगाड़ होगा
है वह बहुत असमंजस में
कैसे सामना करेगी
 अपनी अध्यापिका का 
आए दिन सजा मिलेगी
बिना यूनीफार्म के आने की
वह कैसे कहेगी
 अभी पैसे नहीं हैं
 पर मन में ललक
 शाला जाने की कम नहीं
रोज अपनी अवमानना कैसे सहेगी
शायद यही है प्रारब्ध उसका
उसे  स्वीकार करना होगा
                                                               पर मनोबल कम न होगा 
                                             आशा

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-04-2019) को "दिल पर रखकर पत्थर" (चर्चा अंक-3296) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  3. धन्यवाद संजयटिप्पणी के लिए |
    आशा सक्सेना

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  4. अक्सर बच्चों को ऐसी परिस्थितियों से दो चार होना पड़ता है जो उनमें हीन भावना को जन्म देता है ! मर्मस्पर्शी रचना !

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