12 जून, 2019

इंसानियत के ह्रास पर










इंसानियत के ह्रास  पर
 कितने ही -भाषण सुन   कर
प्रातः काल नींद से जागते ही
मन का सुकून खो जाता है
अखवार में अधिकाँश
 कॉलम भरे होते  है
आपत्ति जनक समाचारों से
मानावता शर्मसार हुई है
मानव के अवमूल्यन से
दरिंदगी से भरी हुई हैं
आधी से अधिक घटनाएं
समाज में इतना विधटन होगा
कभी कल्पना नहीं थी
सारी मान्यताएं खोखली हो रहीं  
 आधुनिकता की भेट चढ़ती  रहीं  
कुछ कहने पर कहा जाता
है यह सोच का ढंग पुराना
आज के बच्चे यह सब नहीं मानते
पर हम तो इतना जानते हैं
जब भी किसी अवला की
 चुन्नी तार तार हुई है 
किसी अबोध के संग दुराचार  हुआ है 
उसे मार कर फैका गया है
निगाहें शर्मसार हुई हैं
मन में पीड़ा होती है 
दरिंदगी की हद होती है
इंसानियत दम तोड़ रही है
आधुनिकता को कोस रही है |
आशा

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3365 दिया जाएगा

    धन्यवाद

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    1. सुप्रभात
      मेरी रचना शामिल करने की सूचना के लिए आभार सर

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  2. बहुत सुन्दर रचना प्रिय सखी
    सादर

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    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद अनीता जी |

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 12/06/2019 की बुलेटिन, " १२ जून - विश्व बालश्रम दिवस और हम - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. वाकई ! आज के नौजवानों की सोच में मानवीय मूल्यों का इतना ह्रास होता जा रहा है कि भविष्य कितना अंधकारमय होगा यह सोच कर ही डर लगता है ! शोचनीय स्थिति है ! सुन्दर रचना !

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