31 दिसंबर, 2019

विराम



                     चाहे जितनी बाधाएं आए
सहज चलते जीवन की रवानी में
समय रुक न पाएगा
 काल चक्र चलता जाएगा |
काल है एक  बहती दरिया  
गति दौनों की होती समान   
पर काल की गति न होती स्थिर 
 वह जल सा बाधित नहीं किसी से |
समय ऊंची उड़ान भरता
 पंख फैला कर  पक्षी सा
किसी भी  बाधा से न डरता
अम्बर में है एक छत्र राज उसका |
 जितना भी उसे पकड़ना चाहे
 मुठ्ठी में रेत सा फिसलता
जीवन  दूर होता जाता
अकारण रूठ कर समय से |
समय के साथ यदि चलना चाहें 
 गत्यावरोधों का सामना करना होगा
यदि पार न कर पाए उन्हें
जीवन में विराम आ जाएगा |
आशा





2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-01-2020) को   "नववर्ष 2020  की हार्दिक शुभकामनाएँ"    (चर्चा अंक-3567)    पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    नव वर्ष 2020 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना चर्चा मंच पर की सूचना हेतु आभार |

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