09 जून, 2020

संग्राम


दिल और दिमाग
हैं तो सहोदर
एक साथ रहते है पर
 संग्राम छिड़ा है  दौनों में |
आए दिन की बहस
 नियमों का उल्लंधन
एक ने चाहा दूसरे ने नकार दिया
हो गई है आम बात  |
कभी दिल की जीत  भारी
 कभी मस्तिष्क की जीत हारी
हार जीत के खेल में
  तालमेल नहीं है  दौनों में |
 नजदीकियां बढ़ते  ही
 नया  विवाद जन्म ले लेता है
फिर से वही बहस
 आए दिन की तकरार
उसमें  उलझे  रहते है दौनों |
  संग्राम थमने का
नाम ही नहीं लेता
  दौनो धरती के हुए  दो ध्रुब
या धरा और  आकाश |
|प्रेम प्यार से  एक साथ
 मिलजुल कर रह नहीं पाते
मिलते ही विरोध दर्शाते  
अपनी दुनिया में जीना चाहते |
 बहुत दुखी हूँ
 किस तरह उनमें तालमेल बनाऊ
 कैसे मध्यस्तता करूं  
 इस  संग्राम का अंत करूं |
 भूले सामंजस्य बना कर
 रहने का मूल मन्त्र
खुद भी रहते परेशान
और दूसरे की भी चिंता नहीं |
 हुए  ऐसे  आत्म केन्द्रित
दो चक्की के पाटों के बीच फंसी हूँ
मेरा क्या होगा कब थमें संग्राग
अब तो यह तक नहीं सोच पाती |
आशा


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-06-2020) को  "वक़्त बदलेगा"  (चर्चा अंक-3728)    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बढ़िया रचना ! मन मस्तिष्क के बीच यह रस्साकशी सदियों से होती चली आ रही है ! परिणाम हमेशा कभी पहले से सोचा नहीं जा सकता !

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  3. यही तो द्विधा है आदमी के मन की.

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  4. भावनाओं और विचार का द्वंद्व ही मनुष्य के विवेक को जन्म देता है। सुंदर रचना।

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    1. धन्यवाद विश्व मोहन जी टिप्पणी के लिए |

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  5. बहुत सुंदर रचना आदरणीया

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