08 जून, 2020

विचलन मन का


 

 आशा  के  पालने  में झूला
ऊंची से ऊंची पैंग बढ़ाई   
मन को फिर भी चैन न आया
तेरा मन क्यूँ घबराया?
निराशा ने डेरा डाला
 तेरे मन के आँगन में
शायद इसी लिए उससे
 तेरा मन  भाग न पाया |
यही विचलन मन में
ठहराव  नहीं  जीवन में  
 किसी निष्कर्ष पर पहुँच  मार्ग
प्रशस्त भी न हो पाया |
कैसे निकले मन की कशमकश से
उलझनों की दुकान से
कहीं तो शान्ति के दर्शन हों
ऊंची पैंगों  का कुछ तो प्रभाव हो |
एक ही आशा लगाए हूँ
बारह वर्ष में तो
घूरे के भी दिन फिरते
फिर तेरे   नहीं क्यूँ  ?
ईश्वर  सब देख रहा है
तुझसे क्यूँ  है  दूरी  उसकी
वरदहस्त जब सर पर होगा 
तेरी निराशा का कोहरा छटेगा |
आशा

8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद शास्त्री जी टिप्पणी के लिए |

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 08 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती सुन्दर प्रस्तुति !

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