16 अक्तूबर, 2020

समदर्शी

 



ना चाह ना किसी की आस की

जब देखा आसपास बड़ी निराशा हुई

मन पर गिरी गाज जब भी

 पंख फैला उड़ना चाहा |

चेहरा बुझा बुझा सा हुआ

अरमानों का निकला जनाजा

आशा निराशा  में बदली

किसी खोज का अंत न हुआ |

थोड़े समय के लिए ही सही

पर मन की बेचैनी कम न हुई

खूब खाया घूमें घामें पर

प्रभाव कुछ न ख़ास हुआ |

हर बार मन ने नियंत्रण खोया

फिर भी रही तसल्ली

बहुत खोया पर कुछ तो पाया

यहीं मुझे भगवान् नजर आया |

यूँ तो कभी दिखाई न दिया

पर  प्रभू का  समदर्शी नाम

 यूँ ही नहीं हुआ

बहुत सार्थक नाम दिया भक्तों ने

दिल से उसे अपनाया |

आशा

  

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 16 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१७-१०-२०२०) को 'नागफनी के फूल' (चर्चा अंक-३८५७) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  3. सुन्दर रचना ! सार्थक सोच ! संतोषी सदा सुखी !

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  4. भावों से भरी सुंदर रचना

    ऐसी ही भावपूर्ण रचनाओं के लिए आप मेरे ब्लॉग पर भी आमंत्रित हैं

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  5. सुप्रभात
    सतीश जी टिप्पणी के लिए आभार सहित धन्यवाद |

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