20 अप्रैल, 2021

वेदना और विरह में अंतर


 

 क्या है अंतर विरह और वेदना में

दौनों में पीड़ा तो होती है

तन को हो या मन को

 कम हो या ज्यादा |

किसी ने सुझाया

उस राह पर जाना ही नहीं

जहां मन को ठेस लगे

जी जले दिल बेचैन हो |

मन की ठेस से ही विरह उपजता

कहीं और से नहीं आता

जो प्रेम करता है वह

विरह से अनजान नहीं |

 दिल चूर चूर होता कांच सा

और चुभ जाता कहीं भी

जब रक्त रंजित होता

 लहूलुहान हो जाती धरा भी |

 शारीरिक  वेदना  तो

सही जा सकती है

 मन  को लगी  चोट

 सहन नहीं होती |

यही विरह वेदना  

चाहे जब सर उठाती है

मन मस्तिष्क को

हिलाकर रख देती है  |

प्रियतम के बिछुड़ने पर

 विरह वेदना होती ऐसी कि

 ऊपर  से दिखाई नहीं देती

मन में रिसाव होता गहरा

 अवसाद गहराता जाता इतना 

और कोई इलाज नहीं इसका

केवल अपनों  की बापिसी ही

 है उपचार विरहणी का |

आशा


 

11 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद आलोक जी टिप्पणी के लिए |

      हटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (२१-०४-२०२१) को 'प्रेम में होना' (चर्चा अंक ४०४३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना की सूचना के लिए आभार अनीता जी |

      हटाएं
  3. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद ओंकार जी |

    जवाब देंहटाएं
  4. अति सुंदर सृजन दी ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर।
    --
    श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    --
    मित्रों पिछले तीन दिनों से मेरी तबियत ठीक नहीं है।
    खुुद को कमरे में कैद कर रखा है।

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह ! बहुत ही सुन्दर विश्लेषण ! बहुत बढ़िया रचना !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: