24 सितंबर, 2021

वर्ण पिरामिड


 

है

मेरी  

चाहत

अपनी ही

तुम्हारी  नहीं

 स्वप्नों में सजी है    

ख्यालों में बसी रहे 

या विलुप्त होने लगे 

नहीं है  दरकार मुझे  |

ओ 

चन्दा 

चमको 

आधी रात 

तारों के साथ 

मुझे भाने लगा

रहना तेरे साथ 

रात भर तारे गिनूं 

भोर होते ही उठ जाऊं |

हे 

कान्हां 

तुम्हारी 

अनुरागी 

भक्ति भाव से 

करूं  आराधन 

तन मन धन  से 

 दिन में भोग लगाऊँ 

 करो पूरी  मेरी कामना | 

आशा  






6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा 25.09.2021 को चर्चा मंच पर होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात
      आभार दिलबाग जी मेरी रचना की सूचना के लिए |

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिए |

      हटाएं

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