16 दिसंबर, 2021

खुले पट मनमंदिर के


                  खुले पट मन मंदिर के

कौन झाँक रहा उनमें से

कभी ख्याल आता कहीं  

 उसका  मनमीत तो नहीं |

बड़ी राह देखी उसकी

 रहा इन्तजार उसी का अब तक

 राह देखना समाप्त हुआ अब 

और समय सामान्य हुआ है | 

है मनमौजी अलमस्त वह

 फिक्र नहीं पालता किसी की

कब कहाँ जाने का मन बना लेता

कोई नहीं जानता चिंता में डूबा रहता |

जिन्दगी के वे क्षण लौट न पाए  

 द्वार खुले रहते थे उसकी बाट जोहने में

 मन को क्लेश होता रहता था

 उसके इन्तजार में |

जाने कब राह देखना आदत में बदला

 यह तक  याद नहीं अब तो

निगाहें द्वार पर लगी रहतीं हैं 

 एक टक राह देखने में |

आशा 

          

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति ! पता ही नहीं चलता इंतज़ार कब आदत बन जाता है ! सुन्दर रचना !

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(१७-१२ -२०२१) को
    'शब्द सारे मौन होते'(चर्चा अंक-४२८१)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      आभार अनीता जी मेरी रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए |

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  3. जिंदगी का मर्म छूती सुंदर रचना ।

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  4. धन्यवाद जिज्ञासा जी धन्यवाद टिप्पणी के लिए |

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  5. कठिन होती हैं इंतजार की घडियां

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  6. इंतजार करना वाकई मुश्किल होता है... सुंदर सृजन...

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  7. इंतज़ार के दर्द को बयां करती बहुत ही मार्मिक रचना...!

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