07 फ़रवरी, 2010

श्रंखला

रेशा-रेशा चुन-चुन कर
जब से उसे बनाया गया ,
कई मुश्किलों में घिरी ,
पर अपनों से न भाग सकी ,
कैसे बीते समय कठिन ,
यह कूट कूट करसिखाया गया ,
जब रेशों का निखारा रूप ,
सुंदरता ने दी दस्तक ,
अनेकानेक रंगों से उसको ,
बहुत प्यार से सजाया गया ,
फिर भी नज़रों से दूर रही ,
न देखा गया न सराहा गया ,
उसमें परिवर्तन होने लगे ,
वह श्रंखला बनी और आगे बढ़ी ,
वह भी कुछ खास न कर पाई,
मेखला बन कर मुसकाई,
मेखला का रूप भी न बाँध सका ,
कोई बंधन भी निभा न सका ,
पर यही मेखला का बंधन ,
जब बना जीवन का दर्शन ,
कोई नहीं जान पाया ,
वह कैसे कहाँ से उठाई गयी ,
अब वही मेखला बन गई श्रंखला ,
कई बार बँधी कई बार खुली ,
फिर भी कोने में पड़ी रही ,
पर एक पारखी पा उसको ,
नए रूप में ले आया ,
अब यही श्रंखला रूप बदल अपना ,
जब कमरे में सज जाती है ,
पड़ती है जब नजर उस पर ,
वह बार-बार खिल उठती है ,
और सदा सराही जाती है |

आशा

04 फ़रवरी, 2010

क्षणिका

आज के इस शुभ अवसर पर ,
है स्वागत आगत आज आपका ,
नित नयी प्रीत प्रगाढ़ बनाये ,
है दिन सब के सौभाग्य का|
आशा

03 फ़रवरी, 2010

तुम मुझे अपनी सी लगती हो






तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो
जब मै मै नहीं होता
तुम में समा जाता हूँ
और न जाने कहाँ गुम हो जाता हूँ |
तुम मुझे अपनी सी लगती हो
जब जाड़े की धूप सी
मुझे छू जाती हो
और शाम को सिमट कर
कहीं छुप जाती हो |
तुम्हारा अस्तित्व मुझे
यह आभास कराता है
कि मैं एक विकसित होता पौधा हूँ
तुम हो एक प्रतान
मुझे बढ़ाती हो
सँवारती हो
पल्लवित होने का
पुष्पित होने का
अवसर खोज लाती हो |
तुम मुझे बहुत प्यारी लगती हो
जब मै तुम में खो जाता हूँ
स्वयं अपने को भूल जाता हूँ
नित नए सोच उभरते हैं
मै उनमें बह जाता हूँ |
तुम में मिलती है मुझे
एक तस्वीर नई
मै उसमें समा जाता हूँ
साथ तुम्हारा पा कर
भावों में बहता जाता हूँ |
मन में उठते भावों को
तुम पर ही लुटाता हूँ
तब मैं मैं नहीं रहता
तुम में ही समा जाता हूँ |
क्या तुम हो अनजान पहेली सी
मै रोज जिसे हल करता हूँ
मै तुम में खुद को पाता हूँ
तुम मुझे सुहानी लगती हो
जब तुम में मैं खो जाता हूँ |

आशा

02 फ़रवरी, 2010

क्षणिका

विदाई के क्षण होते भारी,
कुछ मीठी कुछ यादें खारी ,
सदा यही क्रम रहता जारी ,
प्रीत हमारी पर अनियारी |

01 फ़रवरी, 2010

बात पिछले साल की

पिछले वर्ष ण जाने क्या हुआ इन्द्र देव अचानक रूठ गए |जब गर्मी आई तो बिना पानी के बहुतसी कठिनाइयों का
सामना करना पड़ा |पहले नल रोज आते थे ,फिर ४ दिनमें एक बार और बाद में यह स्थिती हो गई की नल में
टपकती पानी की एक बूंद देखने को भी तरस गए |टेंकरों से दूर दूर से पानी लाया जाता था | अन्य स्त्रोतों को भी सफाई
के बाद उपयोग में लाया गया |पर फिर भी पूर्ति ण हो पाई
शहर से बहुत दूर के जल स्त्रोत से चैनल कटिंग कर बहुतही महंगी योजना अपना कर पानी सोने के भाव उपलब्ध हुआ |पर जैसेही स्थिति सामान्य हुई ,मानसून सक्रीय हुआ हमें अखवार में पढने को मिला की इतनी
मेहनत से बनाई गई चैनल को समाप्त किया जा रहा है | मै कई दिन तक सोचती रही उसको तोड़ने से क्या फायदा
हुआ इतना धन उसे बनाने में लगा और फिर उसे तोड़ने में |क्या यह धन का दुरूपयोग नहीं है ? यदि उस स्त्रोत
के जल का उपयोग नहीं करना था तब भी उसे यथावत रख कर फिर किसी कठिन समय के लिए सहेजा जा सकता था |क्या पता कब इसकी आवश्यकता हो जाती |पर शान को कौन समझाए ,बार बार की तोडा फोड़ी सरकारी
खर्च को बढ़ती है | इससे लाभ की जगह हानी ही होती है जितना सरकार खर्च करती है ,उसका प्रभाव आम नागरिक
पर ही तो पड़ता है |
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30 जनवरी, 2010

मन चंचल

मन चंचल है ,
नहीं कुछ करने देता ,
तब सफलता हाथों से ,
कोसों दूर छिटक जाती है ,
उस चंचल पर नहीं नियंत्रण ,
इधर उधर भटकता है ,
और अधिक निष्क्रिय बनाता है ,
भटकाव यह मन का ,
नहीं कहीं का छोड़ेगा ,
बेचैनी बढ़ती जायेगी ,
अंतर मन झकझोरेगा ,
क्या पर्वत पर क्या सागर में ,
या फिर देव स्थान में ,
मिले यदि न शांति तो ,
क्या रखा है संसार में ,
साधन बहुत पर
जतन ना किया तब ,
यह जीवन व्यर्थ अभिमान है
मन चंचल यदि बाँध ना पाए ,
सकल कर्म निष्प्राण है |
आशा







27 जनवरी, 2010

रिश्ते

जीवन सरल नहीं होता
हर कोई सफल नहीं होता
यदि किताबों से बाहर झाँका होता
अपने रिश्तों को आँका होता
कठिन घड़ी हो जाती पार
जीवन खुश हाल रहा होता |
पहले भी सब रहते थे
दुःख सुख भी होते रहते थे
इस समाज के नियम कड़े थे
फिर भी जीवन अधिक सफल थे |
सुख दुःख का साँझा होने से
कभी अवसाद नहीं होता था
जीवन जीना अधिक सहज था
पर आज जीना हुआ दूभर |
कभी सोचा है कारण क्या
हम रिश्तों को भी न समझ पाए
केवल अपने में रहे खोये
संवेदनायें मरने लगीं
और अधिक अकेले होने लगे |
रिश्तों की डोर होती नाज़ुक
अधिक खींच न सह पाती
यदि समझ न पाए कोई
रिश्तों को बिखरा जाती |
मन पीड़ा से भर उठता
कोई छोर नजर नहीं आता
ग्रहण यदि लग जाये
घनघोर अँधेरा छा जाता |
जिसने रिश्तों को समझा
गैरों को भी अपनाया
वही रहा सफल जीवन में
मिलनसार वह कहलाया |

आशा