13 नवंबर, 2012

कल बाल दिवस है (चानी)

देहरादून जेल में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू अकेले होते थे जेल परिसर में  एक पेड़ के नीचे बैठ कर अक्सर अपनी बेटी को पत्र लिखा  करते थे |एक दिन एक गिलहरी बहुत पास आ गयी और जैसे ही उसे छूना चाहा बहुत तेजी से पेड़ पर चढ गयी |जब दाना खिलाया वह उनसे हिल गयी अब रोज उसी समय वह आती और दाना खाती उसे रोज देखना बहुत अच्छा लगता था |आज एकाएक मुझे वह कहानी याद आई अब आप सब के साथ जिसे बांटना चाहती हूँ ||
याद  आई एक कहानी 
देखी चानी पेड़ पर
चढती उतरती दाना खाती 
अपनी लंबी पूँछ हिलाती 
हाथ में दाना लिए 
उसे अपने पास बुलाया 
पहले हिचकिचाती 
पर हर रोज वहीं आती 
घंटों बैठ उसे निहारना
प्यार से  उसे सहलाना
हाथ से दाना खिलाना  
अपने आप में एक खेल बन गया
साथ उसका भला लगा 
उसकी फुर्ती उसकी चुस्ती 
मन में ऊर्जा भर जाती
कर्मठता  प्रेरित करती
कुछ न कुछ करने को
 निगाहें खोजती उसी को
जिसने  दिया सन्देश
चुस्ती ,फुर्ती ,निर्भयता का
 बन गयी आदर्श मेरा |
आशा



12 नवंबर, 2012

शुभ कामनाएं (दीपावली )

चाँद ने मुंह छिपाया आसमा की गोद में

तारे भी फीके लगे तेरी रौशनी के सामने

आज स्नेह से भरपूर अद्भुद चमक लिए

तेरी चमक के आगे सभी फीके लगे |


 रात अमावस की  काली

तम हरती दीपावली 

हर्षोल्लास से भरे सभी

करते  स्वागत की तैयारी 

हर वर्ष की तरह हिलमिल कर
त्यौहार मनाएं खुशियाँ बाँटें
स्वागत आगत का करके
आपस में सद्व् भाव  बढ़ाएँ|


दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ आप सब को |
आशा










09 नवंबर, 2012

कुछ दोहे


चौक पुराऊँ अंगना ,दीप जलाऊँ द्वार |
खुशियों की सौगात लिए ,आया यह त्यौहार ||

है स्वागत आज तेरा ,पर मन में अवसाद |
मंहगाई की मार से ,होने लगी उदास  ||

दीपक तेरी रौशनी, फीकी लगती आज  |
परम्परा निभा रही है  ,भूली सभी मिठास ||    

पूजन अर्चन के लिए ,पहने वस्त्र सम्हाल  |
खूब चलाई चकरी ,फटाके और अनार ||

नन्ही के आई हिस्से ,फुलझड़ी का तार |
प्रेम बांटने आगया ,मनभावन त्यौहार || 

रंग बिरंगी रौशनी ,बिखरी चारों ओर |
दीपक तेरी रौशनी फीकी सी क्यूँ होय ||





दीप मालिकाएं सजी   ,सभी घरों के पास |
क्यूँ फिर भी लगती कमीं ,दीप जलाऊँ द्वार ||






 

07 नवंबर, 2012

सोच नहीं पाती


भाव आतुर मुखर होने को
दीखता वह सामने
फिर भी शब्द नहीं मिलते
अभिव्यक्ति को |
कोइ बाधा या दीवार नहीं
फिर भी हूँ उन्मना
कहीं कोई अदृश्य रोकता
कुछ कहने को |
यह भी स्पष्ट नहीं
भाव प्रधान हैं या उद्बोधन
उलझी हुई हूँ सुलझाने में
उठते विचारों के अंधड को |
बहुत कुछ है कहने को
पक्ष और विपक्ष में
पर लटक जाता है ताला अधरों पर |
उन्मुक्त भाव दुबक जाते हैं
बस रह जाता है मौन
मन समझाने को  |
कभी वह भी खो जाता है
घर के किसी कौने में
रह जाती हूँ मैं अकेली 
अहसासों में जीने को |
क्यूँ नहीं सदुपयोग
समय का कर पाती
रहती हूँ दूर -दूर
 जीवन की सच्चाई से |
बहुत दूर निकल जाती हूँ
सोच नहीं पाती मैं क्या चाहती हूँ
आग में हाथ जला कर
क्या साबित करना चाहती हूँ ?
आशा

04 नवंबर, 2012

आवागमन इनका



अहसास इनका
समस्त चेतन जगत में
आवागमन प्रक्रिया सचराचर में
अनुभव सभी करते
लाभ   भी लेते
गति इनकी होती अविराम
फिर भी एक सी नहीं होती
परिवर्तित होती रहती
कभी तीव्र तो कभी मंद
कभी अवरुद्ध भी होती
तभी तो कभी गर्म
तो कभी सर्द आहों का
जलवा नजर आता
इन पर नियंत्रण के लिए
अनेकों यत्न किये जाते
कितनी ही औषधियां लेते
ध्यान योग को अपनाते
पर ऐसा न हो पाता
गति ह्रदय की होती संचालित
इनके ही प्रताप से
इनका है क्या नाता मनुज से
किसी ने न जाना
श्वासों का आना जाना
किसी ने न पहचाना
प्राणों के संग हुई
जब भी बिदाई इनकी
किसी ने इस का अनुभव
यदि  किया भी  हो
उसे सब से बाँट नहीं पाया
क्यूं कि वह बापिस 
लौट कर ही नहीं आया |
आशा