12 नवंबर, 2015

रिश्ते कितने किस सीमा तक


 

आये अकेले इस जग में
जाना कब है पता नहीं है
पर अपनाए गए रिश्तों को
बिना विचारे ढोते ही जाना है
ये रिश्ते बने कैसे
कहना सरल नहीं है
पर बंधन में बंधते ही
इनसे बचने की राह नहीं है  
 रिश्ते जनम जनम के होते
सात जन्मों तक निभाने  को 
कच्चे धागे से बंधे हैं
है बंधन अटूट  फिर भी  इनका
जिसे   बिना सोचे समझे
जीवन  पर्यंत निभाना है
बंद  आँखें कर चलते जाना है
रिश्ते कैसे कैसे 
कुछ जन्म से
 कुछ मान्य  या थोपे गए
पर रिश्ते तो रिश्ते हैं
उन्हें परवान चढ़ाना है    
कुछ रिश्ते अनचाहे 
अनजाने में बनते हैं
शायद यही दर्द  के रिश्ते हैं 
लव से कुछ बिना कहे
मन की भाषा समझते हैं
जब जन्में थे अकेले ही
 उनमें क्यूं बंध जाना है
हर रिश्ते की है  अपनी सीमा 
पर अपेक्षाएं भी कम नहीं
कितनी किसे प्राथमिकता दें
यह भी सुनिश्चित नहीं
प्राथमिकता का क्रम
यदि बिगड़ जाए
दरारें दिल में बढ़ती जाएं
कई सोच उभरने लगते हैं
हो रिश्तों की दूकान क्यूं
दिखावे की भरमार क्यूं
जब अकेले ही आये थे
अकेले ही जाना है |
आशा

10 नवंबर, 2015

दीप जलाओ


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हो मुदित  दीपक जलाओ
प्यार से उपहार लाओ
प्यार बांटो प्यार पाओ
इस क्षण भंगुर जीवन में
यही पल मधुर लगते हैं
इन्हें जियो जितना चाहो
बाती कपास की स्नेह से भरपूर
अपना स्वत्व भूल स्वयं जलती है
पर जग जगमग करती है
उसी भाव को अपनाओ
स्नेह के दीपक जलाओ
मेल मिलाप भाईचारा  
हैं इस पर्व की विशेषता
मन से इनको अपनाओ
सौहार्द का आग़ाज कर
तिमिर को दूर भगाओ
है यह पावन पर्व रौशनी का
दीप जलाओ दीप जलाओ
मन का अन्धकार मिटाओ |
आशा


07 नवंबर, 2015

विचलन


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मन की बातें मन में ही
उलझी सी सदा बनी रहतीं
कभी सजग कभी सुप्त
उसे अशांत किये रहतीं
कितना भी प्रयत्न करें
पिंड छोड़ नहीं पातीं
उसे बेचैन किये रहतीं
खुशियों के क्षण मुश्किल से मिलते
दुःख से ही सदा  घिरे रहते
तराजू के दोनो पलड़े
ऊंचे नीचे होते रहते
संतुलित न हो पाते
है कितनी आतुरता
संयम  खुद पर रखने को
फिर भी हल सरल
कोई भी नहीं दीखता
पलड़ा दुःख का झुकता जाता
कम न होना चाहता
विश्रांति के पलों में
झंजावात सा उठाता
अधिक अशांत कर जाता
क्या कभी मुक्ति मिल पाएगी
जीवन के उतार चढ़ावों से
या यूँ ही विचलन बना रहेगा
चिर निंद्रा के आगमन तक |
आशा