01 अप्रैल, 2018

जिन्दगी की धूप -छाँव






जिन्दगी के खेल  में  
 बड़ा है झमेला
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम 
 किसी ने न जाना
 पहले पहल जब आँखें खुली  
लुकाछिपी खेली सूरज से
 कुनकुनी धूप सुबह की
 कहीं  ले गईं मन को
मन रमता  खेलकूद में
शैशव बीतता चढ़ते दिन सा
भरी दोपहर में तपती धूप में
पहुँचते अपने कार्य क्षेत्र में
योवन कब कहाँ खो जाता
समय न मिलता सोचने का
धूप- छाँव के खेल खेलता सूरज
   रथ पर हो कर सवार धीरे से 
 चल देता अस्ताचल को
रौशनी कम कम होने लगती 
  वह दिखता कांसे की थाली सा

जाने कब शाम गुजर जाती 

जान नहीं पाते 

जीवन अनुसरण करता 

आते जाते सूरज का
रात को सो जाता  सूरज 
डेरा जमाते सपने आकर 
जाने क्यूँ महसूस होता 
 अब  समय आ गया
जीवन के अवसान का 
आत्मा की मुक्ति का |
आशा

31 मार्च, 2018

क्षमा







क्षमा भाव अपनाइए
इसे  अनमोल जान
ज़रा सी बात बढ़ जाती
न किया यदि क्षमा दान
बहुत कुछ खोना पड़ता है
यदि अहम रहे  मन में
छोटी छोटी बातों पर
मन के  विचलन से  
बनता है बातों का बतंगड़  
यदि की लापरवाही
इन से बच कर जो चले
उसने ही सफलता पाई
क्षमा करने के लिए
 होता दिल दरिया सा 
छोटी मोटी बातों को 
नजर अंदाज करते ही
मन का कलुष
 जब  छट जाता
तभी मन क्षमा कर पात़ा 
जिसने किया नियंत्रित
अपनी भावनाओं को  
उसने सब को क्षमा किया
खुद पर संयम से ही पाया
 इस अनमोल क्षमा भाव को
क्षमा भाव है अति आवश्यक
सब के लिए समाज में |
आशा

30 मार्च, 2018

बंधी मुठ्ठी




रोज साथ रहते रहते
जाने क्यों मन मुटाव हुआ
आपस में बोलना छोड़ा
एक पूरब एक पश्चिम
एक ही घर में  रहें पर
 संवाद हीनता की स्थिति में
इससे परेशानी हुई बहुत  
बीच बचाव भी बेअसर रहा
मध्यमा ने थोड़ी की पहल
कहा चलो एक ही काम
अलग अलग करो
पहले अवसर छोटी को मिला
वह पूर्ण रूप से असफल रही
अनामिका ने भी जोर अजमाया
वह भी कुछ कर न सकी
मध्यमा ने कुछ कुछ हिलाया
पर वह भी सफल न हो पाई
सब के बुरे हाल देख
तर्जनी ने हार मानली
तब अंगूठे ने मिलाया हाथ सब से   
मुठ्ठी बनाई करने को कार्य
बहुत सरलता से सम्पन्न हुआ वह  
कार्य की पूर्ण आहुति हुई
सब ने कसम खाई
सदा हिलमिल कर रहने की|
आशा

28 मार्च, 2018

भवसागर में नौका






काली अंधेरी रात में 
 डाली अपनी नौका मैंने
इस भवसागर में
पहले वायु  ने बरजा
पर एक न मानी
फिर गति उसकी
बढ़ने लगी मनमानी
जल यात्रा लगी बड़ी सुहानी
नौका ने गति पकड़ी 
लहरों से स्पर्द्धा की ठानी                        
साथ हवा के
 दूर बहुत निकल आए
वायु ने अब रुख बदला
हुआ सीमित चक्रवात में
नाव ने अनुसरण किया
 घूमने लगी भवर में
आसपास कोई न था
प्रभु तेरा ही सहारा था
तेरा नाम लब पर आया
भूली सारी मन की माया  
तुमने सुनी  अर्जी मेरी
गति नाव की हुई धीमीं
तब भी झूल रही
 जीवन मृत्यु के बीच
जीवन के लिए संघर्षरत
न जाने किनारा कब मिलेगा |
आशा

27 मार्च, 2018

तन्हाई






बचपन बीता खेल कूद में
कोई काम न धाम
फिर लगा किताबों का अम्बार
वह  समय भी कब बीता
नहीं रहा अब याद 
समय पंख लगा उड़ने लगा
ब्याह हुआ व्यस्तता बढ़ी  
पहले तो थी कुछ सीखने की ललक  
फिर एक व्यस्त दिनचर्या
सुबह से शाम तक जिन्दगी हुई एकरस
रात कब आती
मैं स्वप्नों में खो जाती
पर तब भी अपने लिए 
रहा अभाव समय का
यही आस रही 
वह समय कभी तो आएगा
जब अपने लिए भी समय होगा
खोजती रहती उन पलों को
जब मैं अकेली रह पाती
और होती मैं और  मेरी तन्हाई
पहले  मुझे चाह थी तन्हाई की
अब जब मैं हूँ एक कमरे में बंद
कुछ कर नहीं पाती
केवल सोचती रह जाती हूँ
ऐसी तन्हाई का क्या लाभ
जब उसका उपयोग न कर पाऊँ
जीवन भार सा लगता है
अब स्वप्न भी यदाकदा ही
याद रह पाते हैं
भूली भटकी यादों का जखीरा
रह गया है मेरे पास 
समय काटने को
तन्हाई की अब जरूरत नहीं
किसी को समय नहीं है
साथ बिताने को 
न ही आवश्यकता तन्हाई की
खुद के लिए कुछ करने को |

आशा