17 दिसंबर, 2020

क्यूँ हुए विचलित

 


 

क्यूँ हुए  विचलित 

 किसी ने तुम्हारा दिल तो नहीं दुखाया  

या मन  की गहराई में

कोई  बुरा ख्याल आया  |

 बैठे हो गुमसुम बेजान प्रस्तर प्रतिमा से  

 मन में अशांति की दुकान लिए

 यह क्या बात हुई दो बोल मीठे बोलो

 मन की ग्रंथि खोलो |

 कुछ तो हल निकलेगा   

जब  मुस्कान अधरों पर आएगी   

समस्या का निदान भी

 निकल ही आएगा |

मन  क्लेश से   न भरेगा  

दो शब्द मीठे मिश्री से उसके

जब तुम्हारे  कानों में पड़ेगे

वही  मिठास मन  में घोलेंगे |

 तुम्हारी आत्मा तृप्त हो जाएगी

स्वयम को तुम सहज अनुभव  करोगे

तुम्हारे मन का मलाल भी

तिरोहित हो जाएगा |

इस बिचलन से मुक्त हो

जीवन प्रसन्नता से जी सकोगे

 सामाजिक प्राणी बनोगे  

  उदासी से दूर बिंदास जीवन जियोगे | 

आशा  

 

 

15 दिसंबर, 2020

ओ समय ठहरो ज़रा


 

ओ समय ठहरो ज़रा

मुझे भी साथ ले चलो

अभी कुछ काम शेष रहे  हैं

उन्हें  पूर्ण कर लेने दो |

जब कोई काम शेष न रहेगा

मन सुकून से रह सकेगा

फिर  लौट न पाऊँगी

इससे नहीं परहेज मुझे |

पर कुछ अवकाश  तो चाहिए

विचार विमर्श करने को

समय यदि मिल जाएगा

कोई गिला शिकवा न रहेगा

मन का भार उतर जाएगा |

वह शांत हो जाएगा

निश्चिन्त हो कर रह  सकूंगी

सुख चैन की जिन्दगी जी सकूंगी 

प्रभु भक्ति में लीन रहूँगी |


आशा  

 

13 दिसंबर, 2020

यह मैंने क्या किया ?

 

हाथों से समय  फिसल गया  

हो गया निश्प्रह निष्क्रीय प्राणी

बन कर  नियति के हाथों का खिलोना

मन मसोस कर रह गया |

इतना कमजोर पहले कभी न था

कितनी भी समस्याएँ आईं

उनसे मुंह न मोड़ा

 डट कर सामना किया उनका

पीठ फेर उनसे कभी भागा नहीं |

 इस बार  जाने क्यों

किसी ने सचेत न किया  

 मैं अंतरात्मा  की आवाज

 तक न सुन पाया |

यह भूल हुई कैसे  अनजाने में

समझ नहीं पाया

अब पश्च्याताप हो रहा है  

यह मैंने क्या किया ?

                                               आशा

11 दिसंबर, 2020

कविता


 

                                    मेरे अंतर्मन से उठते भाव

हुए बेचैन शब्दों में बंधने  को

मीठे मधुर बोलों से बंधे हैं

कविता की पतंग की डोर बने हैं |

रस रंग में सराबोर है

उड़ने को है तैयार कविता

कोई उसे यदि  दे छुट्टी

  आसमान छूने की ललक  रखती है |

वह सबसे टक्कर ले सकती है

हार नहीं स्वीकार उसे

डोर उसकी है इतनी सक्षम

काटती है अन्य पतंगों को |

पेच पर पेच लड़ाती है

फिर भी कटने से बची रहती

है आखिर कविता ही

कभी हार भी जाती है |

डोर से अलग हो व्योम में

स्वतंत्र विचरण करती है

पर फिर से दूने जोश से

मैदान में उतरती है |

इस बार वह रस रंग

 छंद व अलंकारों की पुच्छ्लों से  सजी है

भाषा का लालित्य छलकता है

उसके अंग अंग से |

कविता की पतंग

जब ऊंचाई छू लेती है

सभी मन को थाम लेते हैं

वाह वाह करते नहीं थकते |

 मन के भावों को मिलते  विश्राम के दो पल

 फिर  नई चेतना  अंगडाई लेती है

स्वप्नों की दुनिया  से जागते ही

नया सोच उभर कर आता है |

 वह  शब्दों की डोरी से बंधता जाता  है

 एक नई कविता  को आसमान छूने के लिए

 उड़ने के लिए पंख मिलते हैं

 यही सब के मन को भाता है|

आशा