15 दिसंबर, 2020

ओ समय ठहरो ज़रा


 

ओ समय ठहरो ज़रा

मुझे भी साथ ले चलो

अभी कुछ काम शेष रहे  हैं

उन्हें  पूर्ण कर लेने दो |

जब कोई काम शेष न रहेगा

मन सुकून से रह सकेगा

फिर  लौट न पाऊँगी

इससे नहीं परहेज मुझे |

पर कुछ अवकाश  तो चाहिए

विचार विमर्श करने को

समय यदि मिल जाएगा

कोई गिला शिकवा न रहेगा

मन का भार उतर जाएगा |

वह शांत हो जाएगा

निश्चिन्त हो कर रह  सकूंगी

सुख चैन की जिन्दगी जी सकूंगी 

प्रभु भक्ति में लीन रहूँगी |


आशा  

 

21 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. कोई गिला शिकवा न रहेगा

    मन का भार उतर जाएगा |
    बहुत सुंदर रचना दी ।

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 15 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सुप्रभात
      मेरी रचना की सूचना के लिए आभार दिव्या जी |

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-12-2020) को "हाड़ कँपाता शीत"  (चर्चा अंक-3917)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. सुप्रभात
      मेरी रचना की सूचना के लिए आभार शास्त्री जी |

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  5. वाह वाह ! बहुत सुन्दर प्रस्तुति ! सार्थक सृजन !

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  6. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

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  7. विचार विमर्श करने को
    समय यदि मिल जाएगा
    कोई गिला शिकवा न रहेगा
    मन का भार उतर जाएगा |

    सुन्दर सृजन...

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  8. समय प्रवाहमान है बहुत बढ़िया रचना

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