26 जून, 2010

जब भी कोरा कागज़ देखा

जब भी कोरा कागज़ देखा ,
पत्र तुम्हें लिखना चाहा ,
लिखने के लिए स्याही न चुनी ,
आँसुओं में घुले काजल को चुना ,
जब वे भी जान न डाल पाये ,
मुझे पसंद नहीं आये ,
अजीब सा जुनून चढ़ा ,
अपने खून से पत्र लिखा ,
यह केवल पत्र नहीं है ,
मेरा दिल है ,
जब तक जवाब नहीं आयेगा ,
उसको चैन नहीं आयेगा ,
चाहे जितने भी व्यस्त रहो ,
कुछ तो समय निकाल लेना ,
उत्तर ज़रूर उसका देना ,
निराश मुझे नहीं करना ,
जितनी बार उसे पढूँगी ,
तुम्हें निकट महसूस करूँगी ,
फिर एक नये उत्साह से ,
और अधिक विश्वास से ,
तुम्हें कई पत्र लिखूँगी ,
जब भी उनको पढूँगी ,
मैं तुम में खोती जाऊँगी ,
आत्म विभोर हो जाऊँगी |


आशा