26 जून, 2010

जब भी कोरा कागज़ देखा

जब भी कोरा कागज़ देखा ,
पत्र तुम्हें लिखना चाहा ,
लिखने के लिए स्याही न चुनी ,
आँसुओं में घुले काजल को चुना ,
जब वे भी जान न डाल पाये ,
मुझे पसंद नहीं आये ,
अजीब सा जुनून चढ़ा ,
अपने खून से पत्र लिखा ,
यह केवल पत्र नहीं है ,
मेरा दिल है ,
जब तक जवाब नहीं आयेगा ,
उसको चैन नहीं आयेगा ,
चाहे जितने भी व्यस्त रहो ,
कुछ तो समय निकाल लेना ,
उत्तर ज़रूर उसका देना ,
निराश मुझे नहीं करना ,
जितनी बार उसे पढूँगी ,
तुम्हें निकट महसूस करूँगी ,
फिर एक नये उत्साह से ,
और अधिक विश्वास से ,
तुम्हें कई पत्र लिखूँगी ,
जब भी उनको पढूँगी ,
मैं तुम में खोती जाऊँगी ,
आत्म विभोर हो जाऊँगी |


आशा

9 टिप्‍पणियां:

  1. विरह ,पीड़ा और जुनून सब कुछ ।

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  2. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना है ! शीर्षक ठीक कर लें !

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  3. किन लफ़्ज़ों मे तारीफ़ करूँ…………बेहद दर्द भरी रचना।

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  4. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना है

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  5. बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है ....मर्मस्पर्शी रचना

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  6. आह
    किस सलीसे मर्म को छू गई रचना वाह

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  7. मंगलवार 29 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार


    http://charchamanch.blogspot.com/

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