29 अप्रैल, 2014

क्षणिकाएं

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(१)
दबे पाँव पीछे से आना 
आँखों पर हाथ रख चौंकाना 
सहज भाव से ता कहना 
लगते तुम मेरे कान्हां |
(२)
ये आंसू सागर के मोती 
वेशकीमती यूं ना बिखरें 
भूले से यदि अंखियों में आएं 
चमक चौगुनी करदें |
(३)
यह गुलाब का फूल 
आज हाथों में देखा 
कितना कुछ करने को है 
यह न देखा |
(४)
ना कहने को कुछ रहा 
ना सुनाने को बाकी 
जो देखा है वही काफी 
उसका सिला देने को |
आशा