29 अप्रैल, 2014

क्षणिकाएं

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(१)
दबे पाँव पीछे से आना 
आँखों पर हाथ रख चौंकाना 
सहज भाव से ता कहना 
लगते तुम मेरे कान्हां |
(२)
ये आंसू सागर के मोती 
वेशकीमती यूं ना बिखरें 
भूले से यदि अंखियों में आएं 
चमक चौगुनी करदें |
(३)
यह गुलाब का फूल 
आज हाथों में देखा 
कितना कुछ करने को है 
यह न देखा |
(४)
ना कहने को कुछ रहा 
ना सुनाने को बाकी 
जो देखा है वही काफी 
उसका सिला देने को |
आशा 




16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 30 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-04-2014) को ""सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है " (चर्चा मंच-1598) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. टिप्पणी हेतु धन्यवाद सर |सूचना हेतु आभार |

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  3. बहुत सुन्दर क्षणिकाएं
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

    आग्रह है----
    और एक दिन

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर क्षणिकाएं ! बहुत कुछ कहती सी !

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर .. निर्मल भाव लिए हैं सब छंद ...

    जवाब देंहटाएं
  6. मन को छूती सुन्दर क्षणिकाएँ आशाजी, आभार

    जवाब देंहटाएं

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