01 मई, 2010

बंधन प्रेम का

कुछ ऐसी बात करो मुझसे ,
जो मेरे मन पर छा जाये ,
आहत पक्षी की तरह ,
मुझको भी जीना आ जाये |
आज मुझे छोड़ कर ,
तुम कैसे जा पाओगे ,
यह है एक ऐसा बंधन ,
जिसको ना तोड़ पाओगे |
प्रेम पाश में बाँध कर मेरे ,
खींचते चले आओगे ,
मुझ से बच कर दूर बहुत ,
आखिर तुम कहाँ जाओगे |
मैंने जो प्यार दिया तुमको
उसे कैसे झुठलाओगे ,
मुझ को दंश प्रेम का दे कर ,
तुम कैसे जा पाओगे |
मेरे साथ बिठाये हर पल ,
छाया बन कर साथ चलेंगे ,
यह निस्वार्थ प्रेम का बंधन ,
कैसे उसे भुला पाओगे |


आशा

6 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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  2. मेरे साथ बिताए हर पल ,
    छाया बन कर साथ चलेंगे ,...bhavpurn..

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  3. छाया बन कर साथ चलेंगे ,
    यह निस्वार्थ प्रेम का बंधन ,
    बहुत सुन्दर रचना ...आपकी इस कविता को पढ़ कर ....मेरा साया फिल्म का वो गाना याद आ गया ..'तू जहाँ - जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा ' बस इसी तरह प्रेम पर कुछ लिखते रहिये ....एक अच्छी रचना के लिए धन्यवाद

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  4. Beautiful poem. ek prabhavshali prastuti . very nice.

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  5. सच कहा आपने निस्वार्थ प्रेम का बंधन कोई भुला ही नही सकता..आभार

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  6. VERY GOOD!

    BUT.....!?

    PREM ek bandhan nhi hai.
    PREM ek sthiti hai mun ki.jo sahajata hai.hum abhi sahaj hai bhi kahan?

    www.ashokbindu.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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