03 अगस्त, 2010

अब तक जो कुछ भी लिखा था

अब तक जो कुछ भी लिखा था ,
था केवल आत्म संतुष्टि के लिए ,
पर अब इन कागजों के हाशियों पर ,
कई हस्ताक्षर करवाना चाहती हूं ,
आखिर ऐसा क्या लिखा है ,
जो इतने सारे पाठक हैं ,
पर सभी प्रशंसक ही नहीं हैं ,
कई आलोचक सामने हैं ,
जिनकी टिप्पणियों से ,
विचारों को बल मिलता है ,
कई विचार परिमार्जित होते हैं ,
कई परिष्कृत होते हैं ,
जब वे पल्लवित होते हैं ,
उनमें और निखार आता है ,
मैं चाहती हूं कुछ अनुभव बांटूं ,
कुछ मैं कहूँ कुछ औरों की सुनूं ,
उन पर और मनन करूं ,
अपने लेखन की त्रुटियों को,
मैं दूर करना चाहती हूं ,
कभी यह भी विचार आता है ,
यदि मैं कुछ कर न सकी ,
यह जीवन व्यर्थ न चला जाए |
आशा

12 टिप्‍पणियां:

  1. आत्ममथंन करती रचना अच्छी लगी।बधाई।

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  2. अब तक जो कुछ भी लिखा था ,
    था केवल आत्म संतुष्टि के लिए ,
    पर अब इन कागजों के हाशियों पर ,
    कई हस्ताक्षर करवाना चाहती हूं ,

    हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  3. आप जो लिख रही हैं बेहतरीन लिख रही हैं ! और हमें इसीसे बहुत प्रेरणा मिलती है ! इसी तरह लिखती रहिये ! निखार खुद ब खुद आता जायेगा ! शुभकामनाएं !

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  5. लिख-लिखकर पन्ने भरे, कलम गई है सूख।
    किन्तु कभी मिटती नहीं, जिज्ञासा की भूख।।
    --

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  6. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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