17 अगस्त, 2010

डायरी का हर पन्ना


मेरी डायरी का,
हर पन्ना खाली नहीं है ,
सब पर कुछ न कुछ लिखा है ,
जो भी लिखा है असत्य नहीं है ,
पर पढ़ा जाए जरूरी भी नहीं है ,
कुछ पन्नों पर पेन्सिल से लिखा है ,
जिसे मिटाया जा सकता है ,
कुछ नया लिख कर ,
सजाया सवारा भी जा सकता है ,
कुछ ऐसा जब भी होता है ,
जो मन के विपरीत होता है ,
डायरी में वह भी ,
होता है अंकित,
मन को लगी ठेस,
करती है बहुत व्यथित .
पर पल दो पल की खुशियाँ ,
बन जाती हैं यादगार पल ,
और दे जाती हैं शक्ति ,
उन पन्नों को भरने की ,
पेन्सिल से जो लिखा था ,
रबर से मिट भी गया ,
पर मन के पन्नों पर ,
है जो अंकित ,
उसे मिटाऊं कैसे ,
सारे प्रयत्न व्यर्थ हुए ,
उनसे छुटकारा पाऊं कैसे |
आशा

3 टिप्‍पणियां:

  1. पर मन के पन्नों पर ,
    है जो अंकित ,
    उसे मिटाऊं कैसे ,
    सारे प्रयत्न व्यर्थ हुए ,
    उनसे छुटकारा पाऊं कैसे

    बहुत सुन्दर ....मन के पन्नों को नहीं सुधार जा सकता ....

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  2. सुंदर प्रस्तुति!

    हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।

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  3. इसका एक ही उपाय है मन के पन्नों पर तभी कुछ लिखा जाए जब उसकी सत्यता आप अच्छी तरह से परख लें ! तब शायद उसे मिटाने की ज़रूरत ही ना पड़े ! सुन्दर रचना और संवेदनशील प्रस्तुति ! बधाई !

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