25 अगस्त, 2011

क्या पाया


इंसान का इंसान से यह बैर कैसा
सब जान कर अनजान बना रहता
यूं वैमनस्य लिए कब तक जियेगा
आज नहीं तो कल
सत्य उजागर होगा |
बिना बैर किये जो जी लिया
कुछ तो अच्छा किया
जिंदगी नासूर बनने न दी
चंद क्षण खुशियों के भी जिया |
कुछ नेक काम भी किये
जो जिंदगी के बाद भी रहे |
जिसने नज़र भर देखा उन्हें
उसे भरपूर सराहा याद किया |
जिसके ह्रदय में बैर पनपा
कुछ नहीं वह कर पाया
खुद जला उस आग में
दूसरों को भी जलाया उसी में |
आत्म मन्थन तक न किया
आत्म विश्लेषण भी न कर पाया
बस मिट गया यह सोच कर
क्या चाहा था क्या पाया ?

आशा



11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी भावपूर्ण प्रस्तुति प्रेरणादाई है.
    बैर वास्तव में विष समान ही है.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आप आतीं हैं तो बहुत अच्छा लगता है.

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  2. सार्थक सन्देश देती रचना ... बैर करके क्या पाएगा इंसान ...

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  4. सार्थक एवं सकारात्मक सोच के लिये प्रेरित करती बहुत सुन्दर रचना ! जिसने आत्मचिंतन कर अपने मन के बैर भाव से मुक्ति पा ली उसीने सच्चे अर्थों में जीवन को जिया है यही समझना चाहिये और बाद में उसीको याद भी किया जाता है जो औरों के साथ प्यार बांटता है !

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  5. काश कि लोंग यह समझ सकें कि बैर और नफरत सबसे ज्यादा उसे ही नुकसान पहुंचाते हैं ,जिस दिल में पल रहे हों !
    सार्थक सन्देश!

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  6. सार्थक एवं सकारात्मक सोच को प्रेरित करती बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति....

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  7. वाणी जी और साधना जी की बात से सहमत ।

    बहुत ही अच्छी कविता है।

    सादर

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