02 अक्तूबर, 2011

स्वार्थ

दिन बदले बदली तारीखें
ऋतुओं ने भी करवट ली
है वही सूरज वही धरती
ओर है वही अम्बर
चाँद सितारे तक ना बदले
पर बदल रहा इनसान |
सृष्टि के कण कण में बसते
तरह तरह के जीव
परिष्कृत मस्तिष्क लिये
है मनुष्य भी उनमें से एक |
फिर भी बाज नहीं आता
बुद्धि के दुरुपयोग से
प्राकृतिक संसाधनों के
अत्यधिक दोहन से |
अति सदा दुखदाई होती
आपदा का कारण बनती
कठिनाई में ढकेलती
दुष्परिणामों को जान कर भी
वह बना रहता अनजान |
बढ़ती आकांक्षाओं के लिये
आधुनिकता की दौड़ में
विज्ञान का आधार ले
है लिप्त स्वार्थ सिद्धि में
जब भी होगा असंतुलन
वही
तो होग कोप भाजन
प्रकृति के असंतुलन
ओर बिगड़ते समीकरण
भारी पड़ेगे उसी पर |
ले जाएंगे कहाँ
यह तक नहीं सोचता
वही कार्य दोहराता है
बस जीता है अपनी
स्वार्थ सिद्धि के लिये |
आशा





14 टिप्‍पणियां:

  1. शुभकामनाएं||
    बहुत ही बढ़िया ||
    बधाई ||

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  2. आज की स्वार्थ-सिद्धि आनेवाली पीढ़ी के लिये कितनी कष्टकारी होगी इसे मानव महसूस कर ले तो शायद चेत जाये. विचारणीय सार्थक रचना.

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  3. बहुत सुन्दर,प्रेरक रचना , आभार

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  4. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और यशस्वी प्रधानमंत्री रहे स्व. लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करते हुए मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि!
    इन महामना महापुरुषों के जन्मदिन दो अक्टूबर की आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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  5. सुंदर संदेश देती पोस्‍ट।
    सच है, यह हमारा स्‍वार्थ ही है कि हम प्रकृति प्रदत्‍त संसाधनों का अनाप शनाप तरीके से दोहन करते हैं जिसका खामियाजा आखिरकार हमको ही भुगतना पडता है।
    चिंतनीय विषय पर आपने कलम चलाई... आभार.....

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  6. प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से किया गया दोहन असंतुलित कर देगा प्रकृति को ..अच्छा सन्देश देती अच्छी रचना

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  7. गहरी सोच से भरी कविता | धन्यवाद |

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  8. प्रकृति का असंतुलन भारी ही पड़ेगा ...
    सार्थक रचना!

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  9. भावपूर्ण और सार्थक अभिवयक्ति.....

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  10. भावमय करते शब्‍दों का संगम ।

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  11. बहुत सुन्दर विचारणीय रचना|

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  12. आज के मानव की स्वार्थपरक मानसिकता को पर्त दर पर्त उघाड़ती बहुत सशक्त एवं सार्थक रचना ! अंतत: मनुष्य को ही इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे ! सुन्दर रचना के लिये बधाई एवं शुभकामनायें !

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  13. बहुत अच्छे चित्रों के साथ आज के मनुष्य की सामाजिक व प्राकर्तिक जिम्मेदारियों को शब्दों में रचा है आपने,बेहतरीन सारगर्भित रचना
    मनुष्य अपनी मनुष्यता भूल रहा है जैसे
    प्राकृतिक असुंतलन भी बढ़ा रहा ऐसे
    अपने आपको उसे जगाना होगा
    संवेदनशीलता ही मनुष्यता मानना होगा

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