03 अक्तूबर, 2011

दीवारें


वे चाहते नहीं बातें बनें
ना ही ऐसी वे बढ़ें
खिंचती जाएँ दीवारें दिल में
प्यार दिखाई ना पड़े |
हो सौहार्द और समन्वय
सभी हिलमिल कर रहें
सदभावपर जो भारी हो
कोइ फितरत ऐसी ना हो |
धर्म और भाषा विवाद को
तूल यदि दिया गया
दीवारें खिचती जाएँगी
दरारें भर ना पाएंगी |

आशा


12 टिप्‍पणियां:

  1. हर शब्द यथार्थपरक है और हर पंक्ति भावपूर्ण ! वास्तव में हम ना जाने कब भाषा और धर्म की कल्पित दीवारों को तोड़ कर मुक्त हो सकेंगे जो दिलों में सचमुच की दीवारें खड़ी कर रही हैं ! सुन्दर रचना !

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  2. यथार्थ के धरातल पर रची गयी एक सार्थक प्रस्तुति !

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. ek dam sahi kaha
    log nhi chahte k jung aur man mutav khatm ho

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  5. हो सौहार्द और समन्वय ||

    बहुत-बहुत बधाई ||

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  6. प्रेम और भाईचारा का सार्थक सन्देश देती ....सुन्दर रचना

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