19 फ़रवरी, 2012

है कैसी दुविधा


जाने का जब मन हुआ
मुंह उठा कर चल दिया
ठोकर लगी सम्हल न पाया
माँ की सीख याद आई
नीचे देख सदा चलना
निगाहें नीची कर चला
आगे देख नहीं पाया
टकराते टकराते बचा
पर चालाक ने शोर मचाया
"है अंधा क्या ?
जो आगे भी देख नहीं पाता "
किसी ने मुझे उठाया
और एक उपदेश थमाया
देख कर दाएँ बाएँ
कदम बढ़ाना चाहिए
सड़क पर चलने के लिए
सतर्क होना चाहिए
क्रोध मुझे बहुत आया
स्वयम पर
और आज की दुनिया पर
वर्जनाएं सहते सहते
मन मेरा फटने लगा
पैबंद भी कब तक लगाता
वही बातें सोच कर
मन विचलित होता जाता
जो चाहता हो न पाता
जीना दूभर हो गया
आज के इस दौर में
खुद में रमूं या जग की सुनूं
है कैसी दुविधा
जिससे उभर नहीं पाता |
आशा


14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  2. आज के इस दौर में
    खुद में रमूं या जग की सुनूं
    है कैसी दुविधा ......very nice.

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  3. खुद में रमूं या जग की सुनूं
    है कैसी दुविधा
    जिससे उभर नहीं पाता |

    बहुत सही लिखा है ...
    सादर ...

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  4. कुछ वर्जनाएं पहले मान्यताएं और फिर संस्कार भी बन जाती हैं।
    सुंदर कविता।

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  5. जो चाहता हो न पाता
    जीना दूभर हो गया
    आज के इस दौर में
    खुद में रमूं या जग की सुनूं

    .....मन में चलने वाली उथलपुथल और संघर्ष की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.आभार

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच
    पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  7. जीना दूभर हो गया
    आज के इस दौर में
    खुद में रमूं या जग की सुनूं
    है कैसी दुविधा
    जिससे उभर नहीं पाता |

    बहुत सार्थक रचना...
    सादर.

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  8. सुनो सबकी करो मन की ! अपने विवेक का सहारा लेकर उचित निर्णय लो ! बहुत सुन्दर रचना !

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  9. अनुपम भाव संयोजन ...

    कल 22/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है !
    '' तेरी गाथा तेरा नाम ''

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  10. सही कहा है आपने .सुन्दर रचना..

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  11. वर्षों तक असत्य को सत्य मानकर अनुसरण करते रहने के बाद, यदि अचानक सत्य से मुलाकात हो जाये तो असत्य के साथ जीने का आदि हो चुका हमारा मन और विवेक दोनों, सत्य पर संदेह करने लगते हैं! हमारा अस्तित्व असत्य और सत्य के भ्रम में छटपटाने लगता है! ऐसे में मन और विवेक की चालाकियों से बाहर निकलकर या मन तथा विवेक के तर्कों से मुक्त होकर हृदय को अपनी मौन वाणी बोलने देने का अवसर देना होगा! तब सारे भ्रम, दुःख के अँधेरे और संदेह के बादल स्वत: ही छंट जायेंगे! उजाड़, सूखे और निराशा के गर्त में अवशाद ग्रस्त जीवन में भी आशा, उमंग और ताजगी का अहसास हिलोरें मारने लगेगा! जरूरत केवल इस बात की है की हम निर्लिप्त होकर अपने चालक मन तथा विवेक और कोमल हृदय की सत्य किन्तु मौन वाणी को समझने की समझ पैदा करें!

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  12. यह दुविधा शोचनीय है ...अत्यंत.प्रभावपूर्ण रचना !

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