25 फ़रवरी, 2012

भूली सारे राग रंग


भूली सारे राग रंग 
पड़ते  ही धरा पर कदम
स्वप्न सुनहरा ध्वस्त हो गया
सच्चाई से होते ही वास्ता
 दिन पहले रंगीन
 हुआ करते थे
भरते विविध रंग जीवन में
थी राजकुमारी सपनों की
खोई रहती थी उनमें
पर अब ऐसा कुछ भी नहीं
जो पहले हुआ करता था
है एक जर्जर मकान
और आवरण बदहाली का
देख इसे हताशा जन्मीं
घुली कटुता जीवन में
फिर साहस ने साथ दिया
और कूद पडी अग्नी  में
सत्य की परिक्षा के लिए
दिन रात व्यस्त रहती
कब दिन बीतता कब रात होती
वह जान नहीं पाती
 अब है समक्ष उसके
जर्जर मकान और जलता दिया
बाती जिसकी घटती जाती
कसमसाती बुझने के लिए
गहन विचार गहरी पीड़ा लिए
थकी हारी वह सोचती
कहीं कहानी दीपक की
है उसी की तो नहीं |
आशा





15 टिप्‍पणियां:

  1. थकी हारी वह सोचती
    कहीं कहानी दीपक की
    है उसी की तो नहीं |
    गहरी पीड़ा...गहन विचार...

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. भावों से नाजुक शब्‍द को बहुत ही सहजता से रचना में रच दिया आपने.........

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  4. एक आम स्त्री के जीवन की कहानी को बड़ी सुंदरता के साथ चित्रित कर दिया है आपने रचना में ! बहुत बहुत बधाई !

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  5. दिन रात व्यस्त रहती
    कब दिन बीतता कब रात होती
    वह जान नहीं पाती
    अब है समक्ष उसके
    जर्जर मकान और जलता दिया
    बाती जिसकी घटती जाती
    कसमसाती बुझने के लिए
    गहन विचार गहरी पीड़ा लिए
    थकी हारी वह सोचती
    कहीं कहानी दीपक की
    है उसी की तो नहीं |
    आशा
    भाव सौन्दर्य इस रचना में देखते ही बनता है

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  6. दिन रात व्यस्त रहती
    कब दिन बीतता कब रात होती
    वह जान नहीं पाती
    अब है समक्ष उसके
    जर्जर मकान और जलता दिया

    कोमल भावों की प्रभावशाली प्रस्तुति।

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  7. कितनी सार्थक/बहुमूल्य रचना..
    सादर

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  8. सुन्दर शब्दों में कोमल अहसासों में भिंगोती रचना..

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  10. अच्छी प्रस्तुति , सुन्दर शब्दों व भावों से परिपूर्ण.

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  11. बहुत सुन्दर...

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