25 अप्रैल, 2012

लीन विचारों में




कुछ उलझे से लीन विचारों में
  गर्दन नीची कर बढ़ते
भेड़ों के झुण्ड में जाती एक भेड़ से
चरते सूखी घास पीछे मुड़ नहीं पाते
 सोच  समझ भी खो देते
 उस भेड़ चाल में
 हो  विद्रोही सहनशीलता तज देते
 पर  कभी मेमने के स्वर से
कानों में मिश्री घोलते
अस्थिरता मन की बढ़ती जाती
सुख शान्ति चैन  सब हर लेती 
कुंद बुद्धि होती जाती
जाने वह दिन कब होगा
समृद्धि की बयार बहेगी
जिंदगी सही पटरी पर होगी
लेखनी अवरूद्ध ना होगी
हैं जाने कैसे लोग
कथनी और करनी की
खाई पाट  नहीं पाते
लिखते हैं बहुत कुछ
पर मनोभाव तक पढ़ न पाते
सीमा साहित्य की छू नहीं पाते
नया सोच नई विधाएं अपनाते
क्या बदलाव ला पाएंगे
दर्पण समाज का बन पाएंगे
विष बेल विषमता की
समूल नष्ट कर पाएंगे
जाने कब परिवर्तन होगा
भेड़ चाल से पा छुटकारा
लिखने की स्वतंत्रता होगी
वर्तनी समाज का दर्पण होगी |
आशा


10 टिप्‍पणियां:

  1. जाने कब परिवर्तन होगा
    भेड़ चाल से पा छुटकारा
    लिखने की स्वतंत्रता होगी
    वर्तनी समाज का दर्पण होगी |

    बहुत सुंदर प्रस्तुति,..प्रभावी रचना,..

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

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  2. उस क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रत्याशा तो हम सभी को है ! बहुत ही सार्थक रचना ! अति सुन्दर !

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  3. वाह बहुत खूब ...........असमंजस की स्तिथि हर जगह बनी हुई हैं

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  4. आपकी पोस्ट कल 26/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 861:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  5. बहुत बढ़िया उम्दा प्रस्तुति

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  6. बहुत सही आंकलन हाँ ये सच है कि इंसान की चाल बिल्कुल भेडो जैसी है मतलब भेडचाल एक के पीछे एक अपनी कोई सोच नहीं बदलाव लाने की सोच ही उसके अंदर डर भर देती है नए को धारण करने से पहले ही घबरा जाना इस चाल को बदलना होगा तभी विकास संभव है बहुत खूबसूरत रूप और सुन्दर सोच से लिखी खूबसूरत रचना |

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