04 जून, 2012

है वह कौन




हूँ एक अनगढ़ खिलोना
बनाया सवारा बुद्धि दी
किसी अज्ञात शक्ति ने
पर स्वतंत्र न होने दिया
बुद्धि जहाँ हांक ले गयी  
उस ओर ही खिंचता गया
राह की बाधाओं से
पार पाने के लिए
सफलता और असफलताओं के
  बीच  ही झूलता रहा
जीवन के रंग उन्हें मान
बढता जा रहा हूँ 
अंधकार में डूबा
उन्हें नहीं मानता
प्रकाश की खोज में
अग्रसर होना चाहता
है वह कौन
जो संचालित करती मुझे
उसे ही खोज रहा हूँ
हर कठिन वार सह कर भी
 बचता  रहा हर बार
जीना चाहता हूँ
क्यूं कि हूँ मनुष्य
वही बना रहना चाहता हूँ |

आशा 

11 टिप्‍पणियां:

  1. क्यूं कि हूँ मनुष्य
    वही बना रहना चाहता हूँ |......kya baat hai.....

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  2. जो संचालित करती मुझे
    उसे ही खोज रहा हूँ
    हर कठिन वार सह कर भी
    बचता रहा हर बार
    जीना चाहता हूँ
    क्यूं कि हूँ मनुष्य
    वही बना रहना चाहता हूँ |....बहुत सुन्दर ...सकारात्मक भाव लिए सुन्दर रचना..

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  3. सवतंत्रता खुद ही लेनी होगी ... इस शक्ति का आदर भी तभी होगा ...

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  4. क्यूं कि हूँ मनुष्य
    वही बना रहना चाहता हूँ |

    बहुत ही सात्विक भाव हैं आज की रचना में ! यही अपेक्षित भी है कि मनुष्य ही बने रहें तभी यह मानव जीवन सार्थक हो सकेगा ! सुन्दर रचना !

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