26 जून, 2012

उलझन सुलझे ना


यह कैसा सुख  कैसी शान्ति
कहाँ नहीं खोजा इनको
मन नियंत्रित करना चाहा
 भटकाव कम न हो पाया
यत्न अनेकों किये
पर दूरी कम ना हुई इनसे
किये कई अनुष्ठान
पूजन अर्चन
दिया दान मुक्त हस्त से
फिर भी दूर न रह पाया
पूर्वाग्रहों की चुभन से 
प्रकृति का आँचल थामा
उनसे बचने के लिए
घंटों नदी किनारे बैठा
आनंद ठंडी बयार का
तब भी उठा नहीं पाया
देखे पाखी अर्श में
कलरव करते उड़ाते फिरते
कहीं कहीं दाना चुगते
चूंचूं  चीं चीं में उनकी
मन रम नहीं पाया
देखा नभ आच्छादित
चाँद और सितारों से
शान्ति तब भी न मिली
खोया रहा विचारों में
प्रसन्न वदन खेलते बच्चे
बातों से आकर्षित करते 
पर वह  तब भी न मिला
जिस की तलाश में भटक रहा
अंतस में चुभे शूल
चाहे जब जाने अनजाने
दे जाते दर्द ऐसा
जिसकी दवा नहीं कोई
बोझ दिल का बढ़ जाता
उलझन भरी दुनिया में
सफलता   या असफलता
या सुख दुःख की नौक झोंक
दिखाई दे जाती चहरे पर
तब है पूर्ण सुखी की अवधारणा
कल्पना ही नजर आई 
उलझन सुलझ नहीं पाई |
आशा


13 टिप्‍पणियां:

  1. तब “है पूर्ण सुखी “की अवधारणा
    कल्पना ही नजर आई
    उलझन सुलझ नहीं पाई |
    thoda thoda sukh eun hee talaste talaste jindagi kat hee jaati hai..prabhu nahi chahte aap ek cheej me ram jaayein aaur uski bakee kee kalakari ko bisra dein...sadar badhayee ke sath

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  2. प्रभावित करती ,सुंदर अभिव्यक्ति ...

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  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  4. बहुत सुंदर मन के भाव ...
    प्रभावित करती रचना .

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  5. वाकई 'पूर्ण सुखी' की अवधारणा कल्पना ही है ! जिसे सब सुखी मानते हैं उससे भी पूछना चाहिए कि क्या वह सचमुच सुखी है ! सत्य को उकेरती एक सुन्दर रचना !

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